
@अजय रघुवंशी/Jal Jeevan Mission: केंद्र और राज्य सरकार से पानी की तरह बहने वाले बजट के बावजूद प्रदेश में जल जीवन मिशन कछुआ गति का शिकार है। विभागीय सुस्ती और कमजोर प्लानिंग के कारण पिछले तीन वित्तीय वर्षों में प्रदेश में करीब 4710 करोड़ रुपए खर्च ही नहीं हो सके। यदि इस राशि का समय पर उपयोग कर लिया जाता, तो सूबे के करीब 8.21 लाख घरों में तीन साल पहले ही शुद्ध पेयजल पहुंच जाता। आंकड़ों के मुताबिक वित्तीय वर्ष 2022-23 में 511 करोड़, 2023-24 में 4,143 करोड़ और 2024-25 में 56 करोड़ रुपए का बजट विभाग के पास बिना उपयोग के पड़ा रहा।
आरटीआई से मिली जानकारी के मुताबिक राष्ट्रीय स्तर पर भी आवंटित बजट को पूरी तरह खर्च करने में भारी नाकामी हाथ लगी है। धरातल पर मिशन की स्थिति बेहद असंतुलित है। प्रदेश के कई गांवों की कहानी यह है कि कहीं पानी की विशाल टंकी तो खड़ी कर दी गई है, लेकिन पाइपलाइन नहीं बिछाई गई। जहां पाइपलाइन बिछी है, वहां नल की टॉटियां गायब है या बोरवेल ही नहीं किया गया।
गौरतलब है कि विभाग ने पहले वर्ष 2024 तक हर घर नल कनेक्शन का लक्ष्य रखा था, जो पूरी तरह फेल साबित हुआ। आरटीआई कार्यकर्ता संजय थूल ने मांग की है कि प्रदेश सहित देश के अन्य राज्यों में जल जीवन मिशन के कार्यों का ग्राउंड ऑडिट कराया जाना चाहिए।
प्रदेश में ग्रामीण पेयजल योजनाओं के दीर्घकालिक और सुचारू संचालन को लेकर शुक्रवार को मंत्रालय में मुख्य सचिव विकासशील की अध्यक्षता में उच्च स्तरीय बैठक हुई। बैठक में निर्णय लिया गया कि नल-जल योजनाओं की पूरी कमान अब ग्राम पंचायतों और 'ग्राम जल एवं स्वच्छता समितियों' को सौंपी जाएगी। मुख्य सचिव ने जलापूर्ति सुनिश्चित करने के लिए सोशल ऑडिट कराने के निर्देश दिए।
जल है तो कल है, जल जीवन ज मिशन, हर घर नल-जल, शुद्ध पेयजल की गारंटी… ये तमाम नारे सुनने में अच्छे लगते हैं, लेकिन वास्तव में छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में पानी की जद्दोजहद में दूरस्थ आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों में आम आदमी टूट सा जाता है। शुद्ध पेयजल तो उनके लिए आज भी सपने की तरह है। इस उम्मीद में उनकी कई पीढ़ियां गुजर गई। इन हालात में यहां कहना पड़ेगा-हर घर नल-जल के दावे हुए हवा…? सभी भलीभांति अवगत हैं। कि जल जीवन मिशन केंद्र और राज्य सरकारों का ड्रीम प्रोजेक्ट है। यह सीधे आम जनजीवन के स्वास्थ्य से जुड़ा है।
यही वजह है कि बजट भरपूर रखा गया है। लेकिन, छत्तीसगढ़ में करोड़ रुपए खर्च ही नहीं हो सके। यह राशि समय पर खर्च होती तो करीब 8.32 लाख घरों में नल से पानी पहुंच गया होता। पिछली सरकार के समय भी ऑडिट में बड़ी गड़बड़ियां उजागर हो चुकी है। राष्ट्रीय स्तर पर भी बड़ा बजट अनुपयोगी रह गया। यहां सवाल पैसों का नहीं है, नाकामी की कीमत आम आदमी चुका रहा है।
जाहिर है, इसमें मिलीभगत और भ्रष्टाचार के अजब-गजब खेल हुए हैं। कहीं पर टंकी शोपीस की तरह खड़ी दी गई है। न स्रोत का पता, न पाइप लाइन का। गांवों में ऐसी हैरान करने वाली कई तस्वीरें सामने आ चुकी हैं, जिसे देखकर कोई भी माथा पकड़ ले। इस घुन लगे सिस्टम की कारगुजारियों पर कोई हंसे या रोए… क्या कहा जाए? राजस्थान में मिशन घोटाले की जांच बढ़ी तो पूर्व एसीएस तक आंच पहुंची। गिरफ्तारी भी हुई। लेकिन पानी के लीकेज की यह हालत अमूमन हरराज्य में है। सभी को पता है पानी कहां ठहरा हुआ है, फिर भी जिम्मेदार मौन साधे हुए है। इस फंड की बंदरबांट का कारनामा नया नहीं है। राज्यों में सरकारें कोई भी रही हो।