बीजेपी की राष्ट्रीय महामंत्री व राज्यसभा सांसद सरोज पांडेय ने अपनी ही पार्टी की सरकार के कामकाज पर सवाल खड़े किए हैं।
रायपुर. बीजेपी की राष्ट्रीय महामंत्री व राज्यसभा सांसद सरोज पांडेय ने अपनी ही पार्टी की सरकार के कामकाज पर सवाल खड़े किए हैं। सरोज पांडेय ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे पी नड्डा को पत्र लिखकर बताया कि छत्तीसगढ़ के दुर्ग और भिलाई में जानलेवा बन चुके डेंगू को लेकर प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री अजय चंद्राकर का कामकाज संतोषजनक नहीं है।
उन्होंने पत्र में लिखा कि प्रदेश में डेंगू के हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। लेकिन राज्य सरकार के स्वास्थ्य व्यवस्था से उनका भरोसा उठता जा रहा है। उन्होंने कहा - अगर यहां गंभीरता से ध्यान नहीं दिया गया, तो हालात बेहद ही गंभीर हो जाएंगे। सरोज ने दुर्ग-भिलाई में डेंगू प्रभावितों के लिए एम्स अस्पताल के जरिये केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री से मदद मांगी है।
अब तक भिलाई नहीं पहुंचे स्वास्थ्य मंत्री चंद्राकर
भिलाई में डेंगू से हुई पहली मौत के 23 दिन बाद भी स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री अजय चंद्राकर को वहां पहुंचने की फुरसत नहीं मिली है। इस बीच प्रदेश में डेंगू से अब तक कुल 27 मौतें हो चुकी हैं, जिसमे भिलाई में अब तक 26 लोगों की मौत हो चुकी है। पीडि़तों के परिजनों का कहना है कि अगर स्वास्थ्य मंत्री मौके पर जाकर हालात नहीं देखेंगे तो त्रासदी की गंभीरता उनके समझ में कैसे आएगी।
स्वास्थ्य आयुक्त बोले- डेंगू पर काबू पाने में लगेगा समय
इससे पहले स्वास्थ्य मंत्री अजय चंद्राकर ने डेंगू को नियंत्रित कर लेने का दावा किया था। इस बीच स्वास्थ्य आयुक्त आर. प्रसन्ना ने मीडिया से बातचीत के दौरान स्वास्थ्य मंत्री अजय चन्द्राकर के बयान के उलट बताया कि डेंगू का वायरस एक बार फैल गया तो उसपर काबू पाने में वक्त लगता है। उन्होंने कहा, यह लंबी प्रक्रिया है, इसकी समयसीमा भी बताना संभव नहीं है।
स्वास्थ्य आयुक्त ने बताया, अभी प्रदेश भर के अस्पतालों में डेंगू के 615 संदिग्ध मरीज भर्ती हैं। इनमें से अधिकतर दुर्ग-भिलाई के ही हैं। उन्होंने बताया वहां अस्पतालों में नए मरीजों के लिए जगह नहीं बची है। इसलिए स्वास्थ्य विभाग हाफडे होम बनाने की सोच रहा है, जहां कम गंभीर मरीजों को रखकर उनकी सांत्वना के लिए इलाज किया जाएगा।
सभी को भर्ती करने की जरूरत नहीं
स्वास्थ्य आयुक्त का कहना था, डेंगू होने पर सभी मरीजों को अस्पताल में भर्ती करने की जरूरत नहीं पड़ती। उनका दावा था, 100 में से एक या दो को ही अस्पताल में भर्ती कर इलाज की जरूरत पड़ती है। कम गंभीर मरीजों को घर पर रहकर ही इलाज कराना चाहिए।