
Chhattisgarh Hospital News: छत्तीसगढ़ के सरकारी अस्पतालों में यूनानी और होमियोपैथी पद्धति के डॉक्टर मरीजों का इलाज कर रहे हैं, लेकिन इन चिकित्सा पद्धतियों में डिग्री हासिल करने के लिए प्रदेश के छात्रों के पास पर्याप्त सरकारी संस्थान नहीं हैं। राज्य में एक भी सरकारी यूनानी या होमियोपैथी कॉलेज नहीं है, जिसके कारण हर साल 450 से अधिक छात्र पढ़ाई के लिए दूसरे राज्यों का रुख कर रहे हैं। इससे छात्रों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ने के साथ उनका समय भी दूसरे राज्य में रहने और पढ़ाई करने में खर्च हो रहा है।
राजधानी रायपुर में यूनानी और होमियोपैथी का एक-एक निजी कॉलेज संचालित हो रहा है। हालांकि, छात्रों की संख्या और मांग को देखते हुए ये संस्थान पर्याप्त नहीं हैं। प्रदेश के दूसरे जिलों में इन पाठ्यक्रमों के लिए कोई कॉलेज नहीं है। वर्तमान में राज्य की संबंधित काउंसिल में करीब 2900 होमियोपैथी और 400 यूनानी डॉक्टर पंजीकृत हैं। इनमें बड़ी संख्या ऐसे डॉक्टरों की है, जिन्होंने दूसरे राज्यों से डिग्री हासिल करने के बाद छत्तीसगढ़ में अपना पंजीयन कराया है।
प्रदेश में सरकारी कॉलेज नहीं होने का सीधा असर छात्रों पर पड़ रहा है। हर साल करीब 450 से ज्यादा विद्यार्थी यूनानी और होमियोपैथी की पढ़ाई के लिए दूसरे राज्यों में जाते हैं। कॉलेज की फीस के अलावा छात्रों को कमरे का किराया, भोजन और आने-जाने का खर्च भी उठाना पड़ता है। ऐसे में सामान्य और मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए दूसरे राज्य में रहकर पढ़ाई करना अतिरिक्त आर्थिक बोझ बन जाता है।
जानकारी के मुताबिक, छत्तीसगढ़ राज्य बनने से पहले प्रदेश में तीन से ज्यादा होमियोपैथी कॉलेज संचालित होते थे। समय के साथ ये संस्थान एक-एक कर बंद होते चले गए। वहीं यूनानी शिक्षा के लिए भी रायपुर में ही कॉलेज उपलब्ध है। विशेषज्ञों का कहना है कि प्रदेश में कम से कम एक-एक सरकारी यूनानी और होमियोपैथी कॉलेज होना चाहिए। इससे छात्रों को अपने राज्य में ही पढ़ाई करने का अवसर मिलेगा और इन चिकित्सा पद्धतियों के लिए प्रशिक्षित डॉक्टरों की संख्या भी बढ़ाई जा सकेगी।
कोरोना महामारी के बाद आयुर्वेद और होमियोपैथी समेत आयुष पद्धतियों से इलाज कराने वाले लोगों की संख्या में बढ़ोतरी देखने को मिली है। केंद्र सरकार भी आयुष चिकित्सा पद्धतियों को बढ़ावा देने के लिए कई स्तरों पर काम कर रही है। इसके बावजूद छत्तीसगढ़ में यूनानी और होमियोपैथी की उच्च शिक्षा के लिए सरकारी संस्थानों की कमी बनी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि राज्य में सरकारी कॉलेज शुरू किए जाएं तो इसका फायदा छात्रों के साथ स्वास्थ्य व्यवस्था को भी मिल सकता है।
यूनानी और होमियोपैथी के संबंधित डिग्री पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए NEET क्वालिफाई करना अनिवार्य है। ऐसे में नीट क्वालिफाइड छात्रों के सामने एमबीबीएस, डेंटल और अन्य मेडिकल पाठ्यक्रमों के विकल्प भी होते हैं। कम स्कोर वाले कई विद्यार्थी दोबारा परीक्षा की तैयारी के लिए ड्रॉप लेते हैं। वहीं, जो छात्र यूनानी या होमियोपैथी में करियर बनाना चाहते हैं, उन्हें राज्य में सीमित कॉलेज होने के कारण बाहर जाना पड़ता है।
पं. दीनदयाल उपाध्याय हेल्थ साइंस एंड आयुष विश्वविद्यालय इन पाठ्यक्रमों से जुड़ी शैक्षणिक प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। विश्वविद्यालय पाठ्यक्रमों का संचालन, परीक्षाएं और कॉलेजों को एफिलिएशन देने का काम करता है। विशेषज्ञों का कहना है कि जब राज्य में इन पद्धतियों की शिक्षा और चिकित्सा व्यवस्था मौजूद है, तो सरकारी स्तर पर कॉलेज खोलने की दिशा में भी पहल होनी चाहिए। इससे छात्रों को दूसरे राज्यों का रुख नहीं करना पड़ेगा और प्रदेश में ही नए डॉक्टर तैयार किए जा सकेंगे।