
Chhattisgarh Mid Day Meal: छत्तीसगढ़ में बच्चों के पोषण को बेहतर बनाने और किसानों को मोटे अनाज की खेती के लिए प्रोत्साहित करने की तैयारी की जा रही है। इसके तहत स्कूलों में मिलने वाले मध्यान्ह भोजन और आंगनबाड़ियों के माध्यम से वितरित होने वाले पोषण आहार में मिलेट्स यानी मोटे अनाज को शामिल करने की संभावनाएं तलाशी जा रही हैं। इनमें कोदो, कुटकी, रागी और मक्का जैसी फसलें शामिल हैं।
इस पहल का उद्देश्य पोषण योजनाओं में स्थानीय अनाज के उपयोग को बढ़ावा देने के साथ-साथ इनके उत्पादन और मांग में वृद्धि करना है। हालांकि, फिलहाल इसे लेकर विचार-विमर्श किया जा रहा है। मध्यान्ह भोजन और आंगनबाड़ियों के पोषण आहार में मिलेट्स को शामिल करने का अंतिम निर्णय होना अभी बाकी है।
मिलेट्स के उत्पादन और उपयोग को बढ़ावा देने के संबंध में बुधवार को मंत्रालय महानदी भवन में एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई। मुख्य सचिव विकासशील की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में मोटे अनाज के उपार्जन, उत्पादन और उपयोग से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गई। बैठक में इस बात पर विचार किया गया कि स्कूल शिक्षा विभाग और महिला एवं बाल विकास विभाग की पोषण योजनाओं के माध्यम से मिलेट्स की खपत कैसे बढ़ाई जा सकती है। इसके लिए मध्यान्ह भोजन योजना और आंगनबाड़ियों में वितरित होने वाले पोषण आहार में इनके इस्तेमाल की संभावनाओं पर मंथन किया गया। यदि भविष्य में इस दिशा में निर्णय लिया जाता है, तो बच्चों को दिए जाने वाले भोजन में स्थानीय स्तर पर उत्पादित मोटे अनाज का उपयोग बढ़ सकता है।
छत्तीसगढ़ में कोदो, कुटकी और रागी जैसी फसलों को बढ़ावा देने की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं। इन फसलों को मिलेट्स के रूप में जाना जाता है। इनके उत्पादन और उपयोग को बढ़ाने के लिए सरकारी योजनाओं में संभावित इस्तेमाल पर चर्चा की जा रही है। मध्यान्ह भोजन और आंगनबाड़ी के पोषण आहार में मिलेट्स का उपयोग होने से इन अनाजों की मांग बढ़ाने में मदद मिल सकती है। इससे किसानों के लिए इनके उत्पादन की संभावनाएं भी बढ़ सकती हैं। हालांकि, इसके लिए अनाज की उपलब्धता, खरीद व्यवस्था, प्रसंस्करण और भोजन तैयार करने की प्रक्रिया जैसे पहलुओं पर भी ध्यान देना होगा।
बैठक में केवल बच्चों के पोषण पर ही नहीं, बल्कि किसानों को मोटे अनाज की खेती के लिए प्रोत्साहित करने पर भी चर्चा हुई। इसके साथ ही फसल विविधीकरण को बढ़ावा देने के उपायों पर विचार किया गया।फसल विविधीकरण का मतलब है कि किसान पारंपरिक फसलों के साथ दूसरी उपयुक्त फसलों की खेती के विकल्प भी अपनाएं।
कोदो, कुटकी और रागी जैसी फसलों को प्रोत्साहन मिलने से किसानों को खेती के नए अवसर मिल सकते हैं। सरकारी पोषण योजनाओं में इन अनाजों का उपयोग बढ़ने से इनकी नियमित मांग तैयार करने की संभावनाएं भी बन सकती हैं। हालांकि, किसानों को इसका कितना लाभ मिलेगा, यह खरीद व्यवस्था, निर्धारित कीमतों और योजना के क्रियान्वयन पर निर्भर करेगा।
मिलेट्स के उत्पादन, उपार्जन और उपयोग को बढ़ावा देने के संबंध में आयोजित बैठक में विभिन्न विभागों के वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए। बैठक में मुख्यमंत्री एवं ऊर्जा विभाग के प्रमुख सचिव सुबोध सिंह, महिला एवं बाल विकास विभाग की प्रमुख सचिव शहला निगार और स्कूल शिक्षा विभाग के सचिव डॉ. कमलप्रीत सिंह मौजूद थे। इसके अलावा वित्त एवं जनसंपर्क विभाग के सचिव डॉ. रोहित यादव, खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता संरक्षण विभाग की सचिव रीना बाबा साहेब कंगाले और कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के सचिव सिद्धार्थ कोमल परदेशी सहित अन्य अधिकारी भी बैठक में शामिल हुए।
छत्तीसगढ़ में मिलेट्स को स्कूलों के मध्यान्ह भोजन और आंगनबाड़ियों के पोषण आहार से जोड़ने की संभावनाओं पर चर्चा को बच्चों के पोषण और स्थानीय कृषि उत्पादन के बीच तालमेल बढ़ाने की दिशा में एक कदम माना जा सकता है। फिलहाल सरकार की ओर से इस विषय पर विचार किया जा रहा है। अब आगे यह देखना होगा कि मिलेट्स को पोषण योजनाओं में शामिल करने के संबंध में क्या निर्णय लिया जाता है और इसे लागू करने के लिए किस तरह की व्यवस्था तैयार की जाती है।