रायपुर

World Day Against Child Labour: कार्रवाई के बावजूद बाल श्रम की गहरी जड़ें, छत्तीसगढ़ में अब भी मजदूरी की भट्टी में झुलस रहे बच्चे, चौंका देगी सच्चाई

Child Labour in Chhattisgarh: छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में सरकारी अभियानों, रेस्क्यू ऑपरेशनों और जागरूकता कार्यक्रमों के बावजूद यह समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हो सकी है।

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Jun 12, 2026
Child Trafficking in Chhattisgarh
Child Trafficking in Chhattisgarh: मजदूरी की भट्टी में झुलस रहे बच्चे (फोटो सोर्स- AI)

रायपुर@ताबीर हुसैन। World Day Against Child Labour 2026: दुनियाभर में 12 जून को बाल श्रम निषेध दिवस मनाया जाता है लेकिन छत्तीसगढ़ में यह सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि कड़वी हकीकत की याद दिलाता है। सरकारी अभियान, पुलिस रेड और जागरुकता कार्यक्रमों के बावजूद राज्य में बाल श्रम को पूरी तरह रोक पाना अभी भी बड़ी चुनौती बना हुआ है।

ग्रामीण क्षेत्रों, छोटी फैक्टरियों और अनौपचारिक सेक्टर में बच्चे आज भी शिक्षा के बजाय मजदूरी की चक्की में पिस रहे हैं। पिछले वर्षों में छत्तीसगढ़ में बाल श्रमिकों के कई बड़े रेस्क्यू ऑपरेशन हुए हैं, जो दिखाते हैं कि प्रशासन सोया नहीं है, लेकिन ये केस भी बता रहे हैं कि इस समस्या से पार पाना इतना आसान नहीं है क्योंकि इनकी जड़ें बहुत गहरी हैं।

रायपुर मशरूम फैक्ट्री कांड

पिछले साल 2025 नवंबर में रायपुर की एक मशरूम यूनिट से 131 बाल मजदूर (80 से ज्यादा लड़कियां) रेस्क्यू किए गए। 14-17 साल के ये बच्चे खतरनाक रसायनों के बीच 10-12 घंटे काम करते थे। एनएचआरसी, महिला एवं बाल विकास विभाग और एनजीओ की संयुक्त टीम ने यह कार्रवाई की। कई बच्चे पड़ोसी राज्यों से ट्रैफिक किए गए थे।

कबीरधाम बैगा जनजाति रेस्क्यू

पिछले महीने कवर्धा जिले में 13 बैगा जनजाति के बच्चे (8-15 साल) बंधुआ मजदूरी से मुक्त कराए गए। कन्हा नेशनल पार्क क्षेत्र के पास कैटल फार्म में ये बच्चे दिन-रात काम करते थे। पुलिस ने 10 ट्रैफिकर्स को गिरफ्तार किया।

पार्ले-जी फैक्ट्री मामला

साल 2019 रायपुर के अमासिवनी में पार्ले-जी बिस्किट की थर्ड-पार्टी यूनिट से 26-27 बाल मजदूर रेस्क्यू हुए। 12-16 साल के बच्चे 12 घंटे की शिफ्ट में महज 5-7 हजार रुपए माह पर काम करते थे। इस मामले ने पूरे देश में सुर्खियां बटोरीं और कंपनी को उत्पादन रोकना पड़ा था।

चुनौतियां क्यों बनी हुईं?

  • अनौपचारिक अर्थव्यवस्था: छोटी फैक्टरियां, ईंट भट्ठे, खेतिहर काम और घरेलू काम में बच्चे आसानी से छिप जाते हैं।
  • गरीबी और स्कूल ड्रॉपआउट: एनएफएचएस और शिक्षा विभाग के आंकड़ों में कई बच्चे स्कूल छोडक़र काम पर लग जाते हैं।
  • ट्रैफिकिंग: पड़ोसी राज्यों से बच्चे लाए जाते हैं।
  • पुनर्वास की कमी: रेस्क्यू के बाद कई बच्चे दोबारा श्रम में फंस जाते हैं।

प्रयास जारी है

कार्रवाई और जागरुकता के बावजूद चुनौतियां बनी हुई हैं, लेकिन हमारा प्रयास निरंतर जारी है। रेस्क्यू के बाद पुनर्वास पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है ताकि बच्चे दोबारा श्रम में न फंसें।-हिमशिखर गुप्ता, सचिव, श्रम विभाग

बालश्रम पर सख्ती: रेस्क्यू के साथ पुनर्वास को भी बनाया प्राथमिकता

पदभार संभालने के बाद बालश्रम के खिलाफ नियमित कार्रवाई के लिए श्रम विभाग, महिला एवं बाल विकास विभाग तथा अन्य संबंधित एजेंसियों के साथ समन्वय स्थापित किया गया। अब केवल विशेष अवसरों पर नहीं, बल्कि हर 15 से 18 दिनों में संयुक्त अभियान चलाकर बालश्रम में संलग्न बच्चों को रेस्क्यू किया जा रहा है। साथ ही उनके पुनर्वास, शिक्षा और सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है।

इस दौरान कांकेर, दंतेवाड़ा, कबीरधाम और अन्य जिलों में कई बच्चों को श्रम से मुक्त कराया गया। आयोग ने निर्देश दिए हैं कि बालश्रम के मामलों में यदि बच्चों के साथ शारीरिक या मानसिक प्रताड़ना हुई हो तो किशोर न्याय अधिनियम की धारा 75 भी अनिवार्य रूप से लगाई जाए। हाल ही में तेंदूपत्ता तुड़ाई और ईंट-भट्ठों में काम करा रहे बच्चों को भी रेस्क्यू किया गया। लगातार कार्रवाई और जागरूकता के कारण अब दूरस्थ क्षेत्रों से भी लोग बालश्रम की शिकायतें दर्ज करा रहे हैं। - वर्णिका शर्मा, अध्यक्ष बाल संरक्षण आयोग

Published on:
12 Jun 2026 02:04 pm