
Mobile Addiction: आज के डिजिटल युग में बच्चों में मोबाइल लत एक गंभीर और खतरनाक समस्या का रूप लेता जा रहा है। फोन का अत्यधिक उपयोग बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डाल रहा है, जिसके चलते वे उग्र, अधीर और हिंसक होते जा रहे हैं। एम्स के मनोरोग विभाग द्वारा स्कूलों में किए गए सर्वे और मामलों से चौंकाने वाले खुलासे सामने आए हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि कोरोनाकाल में ऑनलाइन क्लास के नाम पर बच्चों के हाथ में जो मोबाइल थमाया गया था, वह अब गंभीर लत बन चुका है। एम्स के मनोरोग विभागाध्यक्ष डॉ. लोकेश सिंह के अनुसार, प्रदेश के लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर सर्वे का काम पूरा हो चुका है और रिपोर्ट तैयार है, हालांकि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय से प्रकाशन की अनुमति का इंतजार है। मोबाइल गेम्स में मिलने वाले तुरंत रिजल्ट की चाहत बच्चों में वास्तविक जीवन में भी घर कर जाती है, जो असल दुनिया में संभव नहीं है। इसके चलते 13 से 17 वर्ष के किशोर गेम की आभासी दुनिया को ही अपनी असली दुनिया मानने लगे हैं।
किशोर उम्र : शिक्षा, खेल, नींद और परिवार के साथ समय का संतुलन बनाकर ही स्क्रीन का उपयोग करें।
रोल मॉडल बनें: माता-पिता और शिक्षक बच्चों के सही मार्गदर्शक और प्रेरणास्त्रोत बनें।
केस 1: 11वीं का एक 16 वर्षीय छात्र तब उग्र हो जाता है जब उससे मोबाइल छीना जाता है। वह स्कूल जाने के बहाने बनाता है और हर वक्त फोन से चिपका रहता है। मोबाइल कम करने की बात पर वह पेरेंट्स से उलझ जाता है और गुस्से में खाने की प्लेट तक फेंक देता है। फिलहाल साइकेट्रिस्ट के इलाज के बाद उसकी स्थिति में सुधार हो रहा है।
केस 2: 9वीं में पढ़ने वाला 14 वर्षीय बालक देर रात तक मोबाइल पर गेम खेलता था। गेम की लत के कारण उसका व्यवहार इतना हिंसक हो गया कि वह क्लास में साथियों के साथ मारपीट करने लगा। शिक्षकों की लगातार शिकायतों के बाद परिजन उसे डॉक्टर के पास ले गए, जहां इलाज और मोबाइल से पूरी तरह दूर रखने के बाद उसके व्यवहार में बदलाव देखा गया है।
डॉ. लोकेश सिंह, एचओडी, मनोरोग विभाग, एम्स रायपुर के मुताबिक, मोबाइल एडिक्शन बच्चों में गंभीर समस्या बनती जा रही है, जिससे पेरेंट्स भी बेहद परेशान हैं। कई परिवारों के बच्चे मानसिक समस्याओं से जूझ रहे हैं, जिनका समय पर इलाज बहुत जरूरी है।