
रायपुर@के.पी.शुक्ला। Maa Mahamaya Temple: शक्ति उपासना का पर्व प्रारंभ होने के साथ ही मातारानी का आंगन मनोकामना ज्योति से जगमगा रहा है। परिसर में कदम रखते ही आस्था से सिर झुक जाता है। शहर के प्राचीन मां महामाया के दरबार में 11 हजार से अधिक भक्तों की मनोकामना ज्योति प्रज्ज्वलित है। तीन दिन बीते हैं, परंतु हर ज्योति घर का तापमान 50 डिग्री से पार हो चुका है। इतने तापमान में हमारी आस्था दीपों की रखवाली कैसे होते होगी, यह जानने की जिज्ञासा भी स्वाभाविक है।यह जानने की कोशिश की उन्हीं से जो दिन-रात तेल और बाती को संभाल रहे हैं 150 सेवक …।
प्राचीन मां महामाया के हर ज्योति घर के बाहर 15 से 20 सेवकों की टोलियां लगी हुई हैं। हमारी आस्था ज्योति से मातारानी का आंचल दिन-रात चौबीसों घंटे जगमगाते रहें, हर 6 से 8 घंटे में तेल डालना पड़ता है। इस काम में लगे रखवालों ने चर्चा में बताया कि नौ दिनों तक माई की सेवा मानकर खुद को पता देते हैं। पर, कभी मन को पीड़ा नहीं हुई। 50 डिग्री से ज्यादा तापमान में इसी भाव से आस्था दीपों को तेल देते हैं और बातियों का देखते हैं। किसी जोत की बाती तेंढ़ी होकर तेल में डूब न जाए, इस पर पूरी नजर रखनी पड़ती है। साहब… नौ दिनों तक जैसे पूरी दिनचर्या ही बदल जाती है।
इन दिनों मातारानी का आंगन आस्था से छलक रहा है। हर कोई हाथों में चुनरी, नारियल, पुष्प-फल हाथों में लिए हुए मां शक्तिस्वरूपा की चौखड़ा पर। मां भगवती को नारियल, चुनरी अर्पण कर ज्योति घरों का परिक्रमा करते हुए बाहर निकलते हैं। आस्था का ऐसा दृश्य हर देवी मंदिर में नजर आता है। जसगीत की मिठास, मातारानी के जयकारे कण-कण में गुंजित हैं। पुरानी बस्ती के प्राचीन मां महामाया मंदिर में हर रोज 10 हजार श्रद्धालु दर्शन करने पहुंच रहे हैं।
महामाया मंदिर ट्रस्ट कमेटी के व्यवस्थापक पं. विजय कुमार झा बताते हैं कि देवी मंदिर में देश-विदेश में रह रहे 11 हजार 171 भक्तों की मनोकामना ज्योति का पंजीयन हुआ है। तांबे का कशल और तांबे के दीये मंदिर के 10 ज्योति घरों में जगमगा रहे हैं। किसी हॉल में 400 से 800 तो किसी हॉल में 1600 मनोकामना ज्योति के कलश प्रज्ज्वलित हैं। जिनकी देखरेख में सेवकों की पूरी टोली 24 घंटे दो शिफ्टों में आस्था दीपों की देखरेख में लगाई गई है।
राजधानी के पुरानी बस्ती का मां महामाया मंदिर 1400 साल प्राचीन है। वनावट ऐसी ऐसी कि मंदिर के दोनों दरबाजों में काल भैरव पहरा देते हैं। एक तरफ मां महामाया तो दूसरी तरफ समलेश्वरी मांता के दर्शन एक परिसर में होते हैं। जहां उगते सूर्य की किरणें मां समलेश्वरी माता की वंदना करती हैं तो सूर्यदेव की किरणें मां महामाया का चरण चूमते हुए अस्त होती हैं।
प्राचीन महामाया मंदिर में आस्था ज्योतियों की 50 सालों से देखरेख करने वाले भाठागांव के रामगुलाल (बल्ला) बताते हैं कि ज्योति कलश स्थापना के दूसरे दिन से तापमान बढ़ने लगता है। नवरात्र पर्व के नौ दिनों में उनकी टोलियों की पूरी दिनचर्या ही बदल जाती है। आस्था दीपों में तेल देकर जब बाहर निकलते हैं, तो पसीना-पसीना, एक से डेढ़ घंटे तक बाहर की हवा लेते हैं, फिर निहाते हैं। इसी तरीके से 5-5 बार नहाना पड़ता है, तब जाकर शरीर की तपिश कम होती है। इसी तरह की सेवा से उनके परिवारों की रोजी-रोटी चलती है।