
Chhattisgarh Brass Band: रायपुर में गणपति विसर्जन का दौर शुरू हो चुका है। शहर में जगह-जगह गणपति बप्पा की विदाई की तैयारियां चल रही हैं। विसर्जन झांकियों के साथ लोग डीजे और धुमाल की तेज धुन पर नाचते-गाते नजर आ रहे हैं। लेकिन इसी शोर के बीच कभी उत्सव और शादियों की पहचान रहे ब्रास बैंड कलाकारों की आवाज धीमी पड़ती जा रही है। इस बार गणपति विसर्जन के लिए रायपुर के कई ब्रास बैंड संचालकों को एक भी बुकिंग नहीं मिली।
रायपुर ब्रास बैंड कल्याण समिति के अध्यक्ष मोहम्मद फहीम के मुताबिक, कुछ साल पहले शहर में करीब 15 से 18 ब्रास बैंड पार्टियां सक्रिय थीं। इनमें बड़ी संख्या में कलाकार काम करते थे। अब इनकी संख्या घटकर करीब 5-6 रह गई है। कई पुराने और नामचीन बैंड कारोबार बंद कर चुके हैं। फहीम बताते हैं कि पहले गणपति उत्सव, शादी-ब्याह और दूसरे समारोहों में बैंड की नियमित मांग रहती थी। बैंड संचालकों के पास पूरे सीजन काम रहता था। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में डीजे और धुमाल का चलन तेजी से बढ़ने के बाद पारंपरिक बैंड की बुकिंग लगातार कम होती गई।
इस बार गणपति विसर्जन के दौरान भी ब्रास बैंड कलाकारों को काम नहीं मिला। बैंड संचालकों के मुताबिक, जहां पहले विसर्जन झांकियों के साथ ब्रास बैंड की धुन सुनाई देती थी, वहीं अब ज्यादातर जगह डीजे और धुमाल टीमों को प्राथमिकता दी जा रही है। संचालकों का कहना है कि कम कीमत में तेज आवाज और बड़े सेटअप वाला धुमाल लोगों को ज्यादा आकर्षित कर रहा है। इसका सीधा असर ब्रास बैंड के कारोबार पर पड़ा है।
रायपुर में कई पुराने बैंड अब कारोबार में नहीं हैं। बैंड संचालकों के अनुसार सिद्दीकी बैंड हेड ऑफिस, सिद्दीकी दरबार बैंड, गुल मोहम्मद बैंड, सारंग बैंड, श्याम बैंड, बमलेश्वरी बैंड, न्यू राज बैंड और सिख बैंड समेत कई छोटे बैंड की दुकानें बंद हो चुकी हैं। इन कारोबारों के बंद होने का असर सिर्फ संचालकों पर नहीं पड़ा, बल्कि उनसे जुड़े कलाकारों की रोजी-रोटी भी प्रभावित हुई है।
एवरग्रीन बैंड के संचालक साबिर मोहम्मद के मुताबिक, बैंड कारोबार का करीब 90 फीसदी काम अब धुमाल की ओर चला गया है। उनका कहना है कि एक ब्रास बैंड तैयार करने में काफी मेहनत लगती है। कलाकारों को लंबे समय तक अभ्यास करना पड़ता है और कार्यक्रम के लिए पूरी टीम तैयार रखनी होती है। एक बैंड में कई कलाकार होते हैं। उनके रहने, खाने और मेहनताने का खर्च भी संचालक को उठाना पड़ता है। ऐसे में कम बुकिंग और कम भुगतान के बीच पूरी टीम को बनाए रखना मुश्किल हो रहा है।
काम कम होने का असर सीधे कलाकारों पर पड़ा है। साबिर मोहम्मद के मुताबिक, उनके साथ करीब 15 कलाकार काम करते हैं। नियमित काम नहीं मिलने के कारण कोई सब्जी बेच रहा है तो कोई ऑटो चला रहा है। कुछ कलाकारों ने परिवार चलाने के लिए दूसरे काम पकड़ लिए हैं। कलाकारों का कहना है कि उन्होंने वर्षों तक संगीत और बैंड की कला सीखी, लेकिन अब इस हुनर से नियमित रोजगार मिलना मुश्किल होता जा रहा है।
साबिर मोहम्मद बताते हैं कि उन्होंने अपनी जिंदगी के करीब 30-35 साल बैंड के काम में लगाए हैं। उनके परिवार की कई पीढ़ियां इस कारोबार से जुड़ी रही हैं और परिवार में बैंड का करीब 100 साल पुराना इतिहास है। इसके बावजूद अब वे अपने बच्चों को इस काम में आने की सलाह नहीं देते। उनका कहना है कि जिस पेशे से कभी परिवार का घर चलता था, उसी में आज रोजगार की अनिश्चितता बढ़ गई है। कलाकारों को दूसरे काम तलाशने पड़ रहे हैं।
बैंड संचालकों के मुताबिक, करीब 2008 के बाद धुमाल का चलन धीरे-धीरे बढ़ना शुरू हुआ। समय के साथ धुमाल टीमों का सेटअप भी बड़ा होता गया। बड़े वाहनों में साउंड सिस्टम और कई लाउडस्पीकर लगाए जाते हैं। कार्यक्रमों में घंटों तक तेज आवाज में संगीत बजाया जाता है। संचालकों का कहना है कि इस बदलाव के साथ पारंपरिक ब्रास बैंड की मांग लगातार कम हुई। अब गणपति विसर्जन जैसे बड़े आयोजनों में भी डीजे-धुमाल को प्राथमिकता मिलने से स्थिति और गंभीर हो गई है।
ब्रास बैंड संचालकों को डर है कि अगर बुकिंग और काम का यही हाल रहा तो आने वाले वर्षों में शहर में कई और बैंड बंद हो सकते हैं। इससे इस पारंपरिक कला से जुड़े कलाकारों के सामने रोजगार का संकट और बढ़ सकता है। बैंड संचालकों ने प्रशासन से भी इस मुद्दे पर ध्यान देने की मांग की है। उनका कहना है कि ब्रास बैंड केवल एक कारोबार नहीं, बल्कि कई पीढ़ियों से चली आ रही संगीत की परंपरा है। इसे बचाए रखने के लिए कलाकारों और छोटे बैंड कारोबारियों की स्थिति पर भी चर्चा जरूरी है।