
रायपुर@राकेश टेंभुरकर। Bus Service in Chhattisgarh: प्रदेश की सड़कों पर दौड़ रही निजी बसों में सफर करना यात्रियों के लिए किसी खतरे से कम नहीं है। 50 किलोमीटर के सफर में 50 स्टॉपेज और हर आधा किलोमीटर पर बने गड्ढों में हिचकोले खाती ये बसें हादसों को न्योता दे रही हैं। सरकारी बसों के न होने से यात्री मजबूरी में जान हथेली पर रखकर सफर करने को मजबूर हैं।
'पत्रिका' की विशेष ग्राउंड रिपोर्ट में यह कड़वी सच्चाई सामने आई है कि निजी ऑपरेटरों के सिंडीकेट और प्रशासनिक उपेक्षा के कारण राज्य में यात्रियों की सुरक्षा पूरी तरह से रामभरोसे छोड़ दी गई है। देशभर के लगभग हर राज्य में अपनी सड़क परिवहन निगम की बसें सुरक्षित और किफायती सफर दे रही हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ में राज्य निर्माण के 24 साल बाद भी इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। 31 दिसंबर 2002 की रात 12 बजे जैसे ही सरकारी बसों के पहिए थमे, निजी बस ऑपरेटरों ने सड़कों पर मनमानी शुरू कर दी।
राज्य सड़क परिवहन निगम (सपनि) को बंद करने की पटकथा राज्य विभाजन से पहले ही लिख ली गई थी। नेताओं, अफसरों और निजी बस मालिकों के सिंडीकेट ने मिलकर यह साजिश रची। मध्यप्रदेश से बंटवारे में मिली कंडम बसों को लेकर किसी जिम्मेदार ने आपत्ति तक दर्ज नहीं कराई। नुकसान और घाटे का बहाना बनाकर निगम को बंद कर दिया गया, जबकि उन्हीं नीलामी वाली बसों को निजी ऑपरेटरों ने खरीदकर, रंग-रोगन किया और अपना अरबों का साम्राज्य खड़ा कर लिया।
कर्मचारियों के वेतन, भत्ते और वीआरएस के 172 करोड़ रुपए के भुगतान की वसूली के नाम पर निगम की अरबों रुपए की संपत्तियों को सीज कर कौड़ियों के दाम बेच दिया गया। सरकार चाहती तो देनदारी को खुद वहन करके या स्थगित करके निगम को बचा सकती थी, लेकिन जिम्मेदारों ने कुर्की का रास्ता चुना। रायपुर के आमानाका स्थित डिपो को सिटी बस और पंडरी वर्कशॉप को परिवहन विभाग का दफ्तर बना दिया गया। आज इन डिपो में निगम की एक कील भी नहीं बची है; बस जर्जर शेड और भवन ही अवशेष हैं।
निगम बंद होने से पहले रायपुर, जगदलपुर, कोरबा, अंबिकापुर, रायगढ़, दुर्ग और बलौदाबाजार में 10 बड़े डिपो संचालित थे। इसके अलावा रायपुर और बिलासपुर डिवीजन में 2 आधुनिक वर्कशॉप थे, जहां प्रशिक्षित कर्मचारी बसों की मरम्मत और सर्विसिंग करते थे। राज्य निर्माण की सुगबुगाहट शुरू होते ही फंड रोक दिया गया। नई बसों का रास्ता रोका गया और लीज नवीनीकरण बंद कर निजी बस मालिकों को मलाईदार रूट सौंप दिए गए।
निगम बंद होने से पहले ही बसों के कल-पुर्जे गायब किए जाने लगे। कृत्रिम अभाव दिखाकर चालू बसों को कबाड़ घोषित किया गया। हैरान करने वाली बात यह है कि वही कंडम बसें निजी हाथों में जाते ही सालों तक सड़कों पर मुनाफा कमाती रहीं। 'पत्रिका' अपने इस जनअभियान के जरिए मांग करता है कि मध्य प्रदेश और अन्य राज्यों की तर्ज पर छत्तीसगढ़ में भी सरकारी बस सेवा तत्काल बहाल की जाए, ताकि आम जनता को सुरक्षित, सुलभ और सस्ता परिवहन मिल सके।