
रायपुर@राकेश टेंभुरकर। State Transport Corporation: प्रदेश की सड़कों पर दौड़ रही राज्य परिवहन निगम की बसों को नुकसान का निगम बताकर बंद कर दिया गया। जबकि रोजाना हर डिपो से 5 लाख रुपए से ज्यादा और सभी 12 डिपो से करीब 15 करोड़ रुपए का कलेक्शन होता था। बसों के संचालन, मेंटेनेंस, कर्मचारियों के वेतन सहित अन्य खर्चों को मिलाकर करीब 8 करोड़ रुपए हर महीने खर्च होते थे। यानी कुल आय का करीब 50 फीसदी संचालन खर्च में जाने के बाद भी निगम को नुकसान में बताया गया। कर्मचारियों को वेतन तक नहीं दिया जा रहा था। जबकि इसकी हकीकत कुछ और थी। प्राइवेट बसों के संचालन के लिए पहले ही पूरी कहानी तैयार कर ली गई थी।
एकीकृत मध्यप्रदेश के समय राज्य परिवहन निगम मुनाफे में था और इसमें सबसे ज्यादा कमाई छत्तीसगढ़ के विभिन्न रूटों से होती थी। उसी निगम को नुकसान में बताकर करोड़ों की बेशकीमती संपत्तियां मात्र 172 करोड़ रुपए में बेच दी गईं। कर्मचारियों को भी एक झटके में सड़क पर ला दिया गया। यही वजह थी कि छत्तीसगढ़ सेक्टर को निगम की ‘सोने का अंडा देने वाली मुर्गी’ कहा जाता था। रायपुर डिपो की एक बस दिन में 8 से 10 हजार रुपए तक कमाई करती थी, जबकि मध्यप्रदेश सेक्टर में कई बसों की कमाई 3 हजार रुपए भी नहीं थी।
राज्य परिवहन निगम को बंद करने से पहले पूरी कहानी और खाका तैयार कर लिया गया था। राज्य विभाजन से पहले ही पुरानी खटारा बसों को छत्तीसगढ़ भेजकर नई बसों को यहां के सेक्टर से हटा दिया गया था। यह सिर्फ एक निगम के बंद होने की कहानी नहीं, बल्कि सरकारी सिस्टम की नाकामी और सोची-समझी साजिश का मामला था। 1990 के दशक में मध्यप्रदेश राज्य परिवहन निगम की पूरे प्रदेश में 2 हजार से ज्यादा बसें चलती थीं। कुल आय का 45 फीसदी से ज्यादा अकेले छत्तीसगढ़ के रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग, जगदलपुर और अंबिकापुर डिपो से आता था। रेल का पर्याप्त विकल्प नहीं होने से लोग निगम की बसों पर निर्भर थे।
निगम को बंद कर निजी ऑपरेटरों के लिए जगह बनाने कई ऐसे रूट शुरू किए गए, जहां दिनभर में 10 सवारी भी नहीं मिलती थीं। छोटे गांवों तक बसें चलाने से डीजल का खर्च भी नहीं निकलता था। दूसरी ओर, रूट छोटा कर उसी रूट और समय पर निजी बसों को परमिट दिए गए। निजी बसें सरकारी बस से 10 मिनट पहले निकलतीं और सारी सवारी ले जातीं। सरकारी बस पीछे खाली चलती थी। परमिट से मिलने वाला पैसा शासन के खाते में जाता था, जबकि घाटा निगम के खाते में जुड़ता रहा। 1995 तक मुनाफे में रहने वाले निगम को कागजों पर 50 करोड़ रुपए के घाटे में दिखा दिया गया।
छत्तीसगढ़ सरकार ने 31 दिसंबर 2002 को निगम बंद करने का फैसला लिया। उस समय प्रदेश के बड़े शहरों के बीचोंबीच बस स्टैंड, वर्कशॉप और डिपो की करोड़ों की जमीनें थीं। इन्हें मात्र 172 करोड़ रुपए में बेच दिया गया। कर्मचारियों के सामने वीआरएस और दूसरे विभागों में समायोजन का विकल्प रखा गया।
निगम में उस समय 2250 से ज्यादा नियमित और 7 हजार से अधिक दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी थे। उन्हें परिवहन विभाग या अन्य विभागों में समायोजित करने का भरोसा दिया गया। लेकिन नियमित कर्मचारियों को 2-3 लाख रुपए देकर घर भेज दिया गया। यह राशि भी करीब दो साल बाद मिली। दैनिक वेतनभोगियों को सिर्फ आश्वासन मिला।