राजगढ़

एमपी में 100 साल पुरानी अनोखी परंपरा, रावण को मारने के बाद होता है पूजन, मांगी जाती है ‘संतान प्राप्ति’ की मन्नत

Dussehra 2026: राजगढ़ के भाटखेड़ी गांव में दशहरे पर अनूठी परंपरा है, जहां रामलीला में रावण का प्रतीकात्मक वध करने के बाद उसकी पूजा भी की जाती है। करीब सौ साल पुरानी यह प्रथा संतान प्राप्ति की मन्नत से जुड़ी है।
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Oct 20, 2026
रावण की प्रतिमा (Photo Source - Patrika)
रावण की प्रतिमा (Photo Source - Patrika)

Dussehra 2026: दशहरे पर देशभर में रावण दहन की परंपरा है, लेकिन मध्यप्रदेश के राजगढ़ जिले में ब्यावरा के पास स्थित भाटखेड़ी गांव में रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद का दहन नहीं, बल्कि पूजन किया जाता है। करीब सौ साल से अधिक समय से चली आ रही इस अनूठी परंपरा की शुरुआत संतान प्राप्ति की मन्नत पूरी होने से जुड़ी है। यही वजह है कि यहां रावण वध की रस्म निभाने के बाद भी ग्रामीण तीनों की प्रतिमाओं के सामने शीश झुकाकर सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।

संतान प्राप्ति की मन्नत से शुरू हुई परंपरा

ग्रामीणों के अनुसार, करीब सौ वर्ष पहले गांव के एक पटेल की संतान प्राप्ति की कामना पूरी हुई थी। इसके बाद उन्होंने रावण की प्रतिमा स्थापित कर पूजा-अर्चना की परंपरा शुरू की। धीरे-धीरे रावण के साथ कुंभकर्ण और मेघनाद की प्रतिमाएं भी स्थापित कर उनका पूजन किया जाने लगा। पीढ़ियां बदलती रहीं, लेकिन गांव में यह परंपरा आज भी कायम है।

10 दिन रामलीला, फिर रावण वध की रस्म

भाटखेड़ी में दशहरे से पहले दस दिन तक रामलीला का मंचन किया जाता है। इसकी खासियत यह है कि गांव के लोग ही रामायण के प्रमुख पात्रों की भूमिका निभाते हैं। विजयादशमी पर जुलूस के रूप में ग्रामीण एनएच-52 किनारे स्थित प्रतिमा स्थल पहुंचते हैं। यहां राम-रावण युद्ध का मंचन होता है और रावण वध की रस्म निभाई जाती है। इसके बाद रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद की पूजा की जाती है।

आस्था और परंपरा का संगम

दशहरे पर यहां मेला भी लगता है, जिसमें आसपास के गांवों से लोग पहुंचते हैं। ग्रामीणों के लिए यह आयोजन केवल रामलीला तक सीमित नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही आस्था और परंपरा को आगे बढ़ाने का अवसर भी है। बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक पर्व पर रावण वध के बाद उसी की पूजा करना भाटखेड़ी को अलग पहचान देता है।

क्यों मनाया जाता है दशहरा

बता दें कि दशहरा (विजयादशमी) का त्योहार मुख्य रूप से असत्य पर सत्य और बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। यह पर्व हर साल आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है। त्रेतायुग में भगवान श्रीराम ने इसी दशमी के दिन अहंकारी और राक्षसराज रावण का वध किया था, जिसने माता सीता का छलपूर्वक अपहरण कर लिया था। इसी खुशी में रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतले जलाए जाते हैं।

Updated on:
20 Oct 2026 10:29 am
Published on:
20 Oct 2026 10:29 am