
(रिपोर्ट- लक्ष्मीनारायण यादव, ब्यावरा)
Madhya Pradesh Unrecognized Villages: तीन गांव, करीब छह हजार आबादी और अनगिनत उम्मीदें। लेकिन पहचान आज भी अधूरी है। मध्यप्रदेश के राजगढ़ जिले के ग्राम पंचायत आगर के अंतर्गत आने वाले खेजड़-खो, हाथिया-खो और जामुन का पुरा आज भी राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज नहीं हैं। मतदान करने वाले इन ग्रामीणों को अब तक सड़क, शिक्षा और दूसरी बुनियादी सुविधाएं नसीब नहीं हो सकी हैं। बारिश आते ही गांवों का संपर्क टूट जाता है। बच्चे स्कूल नहीं पहुंच पाते और बीमार या गर्भवती महिलाओं को अस्पताल तक ले जाने के लिए चारपाई का सहारा लेना पड़ता है। ग्रामीणों का कहना है कि उनकी सबसे बड़ी मांग गांवों को राजस्व रिकॉर्ड में शामिल कर मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराना है।
दरअसल, गांव तक पहुंचने वाला करीब चार किलोमीटर लंबा रास्ता कच्चा है। बरसात में यह पूरा मार्ग दलदल में बदल जाता है। दोपहिया वाहन तो दूर, पैदल चलना भी मुश्किल हो जाता है। ऐसे में गांव पूरी तरह अलग-थलग पड़ जाते हैं। सबसे ज्यादा परेशानी तब होती है, जब किसी मरीज या गर्भवती महिला को अस्पताल ले जाना पड़ता है। एंबुलेंस गांव तक नहीं पहुंच पाती, इसलिए ग्रामीण मरीजों को खाट या अन्य वैकल्पिक साधनों से मुख्य सड़क तक लेकर आते हैं। कई बार इलाज में देरी भी हो जाती है।
गांव के बच्चों की पढ़ाई भी गंभीर संकट में है। प्राथमिक विद्यालय का भवन पूरी तरह जर्जर हो चुका है। भवन असुरक्षित होने के कारण पिछले एक वर्ष से नियमित पढ़ाई बंद है। बच्चों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था तो की गई, लेकिन बारिश के मौसम में वहां तक पहुंचना भी संभव नहीं हो पाता। नतीजा यह है कि बरसात के दिनों में बच्चों की पढ़ाई लगभग ठप हो जाती है। ग्रामीणों का कहना है कि शिक्षा के अधिकार की बातें तो होती हैं, लेकिन उनके बच्चों को सुरक्षित स्कूल भवन और नियमित शिक्षा अब भी नहीं मिल पा रही है।
ग्रामीणों का कहना है कि वर्षों से वे अपनी समस्याएं प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के सामने रखते आए हैं, लेकिन हालात नहीं बदले। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि तीनों गांव आज भी राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज नहीं हैं। इसी कारण कई विकास योजनाओं का पूरा लाभ भी नहीं मिल पाता। गांवों की पहचान दर्ज कराने के लिए लोग सरकारी दफ्तरों के लगातार चक्कर काट रहे हैं, लेकिन समाधान अब तक नहीं निकला।
पूर्व जनपद सदस्य सीताराम भील, पूर्व सरपंच मानसिंह भील, कनीराम भील और देवेंद्र सहित अन्य ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि अधिकारी बारिश के दौरान गांवों का निरीक्षण करें। उनका कहना है कि इसी मौसम में सड़क, शिक्षा और आवागमन की असली तस्वीर सामने आती है। यदि अधिकारी मौके पर पहुंचेंगे तो ग्रामीणों की परेशानी खुद समझ सकेंगे। ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि अब उनका धैर्य जवाब देने लगा है। आदिवासी समाज से जुड़े मुद्दों और मूलभूत सुविधाओं की मांग को लेकर 27 जुलाई को वे जिला मुख्यालय पहुंचकर प्रशासन को ज्ञापन सौंपेंगे। यदि इसके बाद भी सड़क निर्माण, विद्यालय भवन की मरम्मत और अन्य समस्याओं के समाधान के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए तो व्यापक जनआंदोलन किया जाएगा।
इन गांवों की समस्या पहले भी शासन-प्रशासन के सामने पहुंच चुकी है। ग्रामीणों के अनुसार गांवों को राजस्व रिकॉर्ड में शामिल कराने की मांग कई बार उठाई गई। पूर्व विधायक पुरुषोत्तम दांगी और तत्कालीन विधायक, वर्तमान राज्यमंत्री नारायण सिंह पंवार भी यह मामला विधानसभा में उठा चुके हैं। इसके बावजूद समाधान नहीं निकल सका। तीन वर्ष पहले ग्रामीणों ने एसडीएम कार्यालय पर तालाबंदी कर विरोध भी जताया था, लेकिन उन्हें केवल आश्वासन देकर लौटा दिया गया। अब ग्रामीणों को उम्मीद है कि इस बार उनकी आवाज केवल सुनी ही नहीं, बल्कि उस पर कार्रवाई भी होगी।