
राजसमंद। राजस्थान के राजसमंद जिले में नगर निकाय की सियासत में एक दिलचस्प विरासत देखने को मिली है। नाथद्वारा नगरपालिका की राजनीति में दादा और पिता के बाद अब परिवार की तीसरी पीढ़ी ने भी राजनीति में अपनी जगह बना ली है। दादा और पिता के बाद पोते के चेयरमैन बनने की खबर सामने आते ही यह मामला इलाके में चर्चा का विषय बन गया है।
नगर की राजनीति में इस परिवार का करीब छह दशक से अधिक पुराना जुड़ाव है। अपने दादा स्व. गिरधारीलाल सोनी और पिता नवनीत सोनी के राजनीतिक सफर की कमान नवनिर्वाचित अध्यक्ष परेश सोनी ने थाम ली है। परेश सोनी 2009 में शुरू अपने राजनीतिक सफर के 17वें वर्ष में पालिका चैयरमेन की कुर्सी तक पहुंचे हैं।
इस परिवार की राजसमंद जिले के नाथद्वारा की राजनीति में शुरुआत स्व. गिरधारीलाल सोनी से हुई। वे वर्ष 1961 से 1962 तक जनसंघ से जुड़े रहे और इस दौरान नाथद्वारा नगरपालिका की चैयरमेन बनकर जिम्मेदारी संभाली। उस दौर में नगर पालिका के विकास और व्यवस्थाओं को लेकर उनके कार्यकाल को परिवार की राजनीतिक विरासत की शुरुआत के रूप में देखा जाता है।
इसके बाद स्व. गिरधारीलाल सोनी के पुत्र नवनीत सोनी ने परिवार की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाया। वे वर्ष 1999 से 2004 तक भाजपा से नाथद्वारा नगरपालिका के अध्यक्ष रहे। नगर विकास और पालिका से जुड़े विभिन्न कार्यों में उनकी खासी भूमिका रही।
जनसंघी गिरधारीलाल की तीसरी पीढ़ी में उनके पोते परेश सोनी के हाथ नगरपालिका की कमान आई है। परेश का राजनीतिक सफर भी पार्षद से शुरू होकर अध्यक्ष पद तक पहुंचा। परेश सोनी 2009 से 2014 तक भाजपा से पार्षद रहे। इसके बाद 2014 से 2019 तक भाजपा से पार्षद एवं नगरपालिका उपाध्यक्ष भी बने। 2019 से 2024 तक निर्दलीय पार्षद की भूमिका में रहने के बाद अब भाजपा पार्षद के साथ ही पालिका चैयरमेन बन गए हैं।
राजसमंद नगर परिषद से लोकतंत्र की एक बेहद खूबसूरत और दिल को छू लेने वाली बानगी सामने आई है। शपथ ग्रहण के बाद जब नवनिर्वाचित भाजपा सभापति अनिता पालीवाल बाहर आईं, तो सियासी गलियारों में सुगबुगाहट होना लाजिमी था, क्योंकि उनका सामना सीधे कांग्रेस के पूर्व सभापति अशोक टांक से जो हो गया। लेकिन चुनावी रंजिश और राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता को दरकिनार करते हुए जो हुआ, वह हर किसी के चेहरे पर मुस्कान ले आया। नव निर्वाचित भाजपा की सभापति अनिता पालीवाल ने पूरे आदर के साथ हाथ जोड़कर अशोक टांक का अभिवादन किया और चेहरे पर मुस्कान लिए आगे बढ़ गईं।
वहीं टांक ने भी बड़प्पन दिखाते हुए न केवल उनका अभिवादन स्वीकार किया, बल्कि उन्हें सभापति बनने की बधाई भी दी। राजनीतिक सरगर्मी के बीच आई यह दिलकश तस्वीर यह साबित करती है कि पद और पार्टी भले ही अलग हों, लेकिन आपसी सम्मान और आत्मीयता से बढ़कर कुछ नहीं है। लोकतंत्र की इस अनूठी और प्रेरणादायक तस्वीर सियासी गलियारों में चर्चा का विषय है। जिला परिषद के पास का यह नजारा वाकई राजनीति की एक नई और सकारात्मक परिभाषा गढ़ता है।