
रतलाम। दीपावली पर जहां घर-घर दीप जलाकर खुशियां मनाई जाती हैं, वहीं गुर्जर समाज में इस पर्व को मनाने की एक अनूठी परंपरा है। समाज के परिवार दीपावली से एक रात पहले से अगले दिन दोपहर तक घरों के दरवाजे बंद रखते हैं। दीपक के प्रतिबिंब को वंशवृद्धि और समृद्धि का प्रतीक मानने की लोकमान्यता।
इस दौरान परिवार के सदस्य घर के भीतर रहकर भगवान देवनारायण, कुलदेवताओं और पूर्वजों की आराधना करते हैं। लोकमान्यता है कि इस अवधि में बाहरी व्यक्ति का चेहरा देखने से पूजा खंडित होती है।
भगवान देवनारायण, कुलदेवताओं और पितरों का पूजन
गुर्जर समाज युवा इकाई अध्यक्ष मुरलीधर गुर्जर ने कहा कि परंपरा के अनुसार देवस्थानों की साफ-सफाई कर धूप, नैवेद्य, मिठाई और पकवानों का भोग लगाया जाता है। परिवार के सभी सदस्य एक साथ बैठकर पितरों का स्मरण करते हैं। इस परंपरा का विशेष आकर्षण घर की छत पर गोबर से बनाई जाने वाली तलाई है। इसमें दूध, दही और घी डालकर दीपक प्रज्वलित किया जाता है।
दीपक के प्रतिबिंब को वंशवृद्धि और समृद्धि का प्रतीक मानने की लोकमान्यता
परिवार के सदस्य दीपक की लौ का प्रतिबिंब देखते हैं। समाज में इसे वंशवृद्धि, समृद्धि और कुल की निरंतरता का प्रतीक माना जाता है। गुर्जर ने कहा कि यह हमारी गौरवशाली सांस्कृतिक विरासत है। खुशी की बात है कि युवा पीढ़ी भी पूरे उत्साह और श्रद्धा से इस परंपरा को निभा रही है। इसे आने वाली पीढिय़ों तक पहुंचाना समाज का सामूहिक दायित्व है।
परंपरा में छिपा है कुल और पूर्वजों से जुड़ाव
दीपावली से एक रात पहले घरों के दरवाजे बंद।
अगले दिन दोपहर तक घर के भीतर ही पूजा-अर्चना।
भगवान श्री देवनारायण, कुलदेवताओं और पितरों का पूजन।
गोबर की तलाई में दूध, दही, घी डालकर दीप प्रज्वलित।
दीपक के प्रतिबिंब को वंशवृद्धि और समृद्धि का प्रतीक मानने की लोकमान्यता।
युवा पीढ़ी भी श्रद्धा के साथ निभा रही सदियों पुरानी सांस्कृतिक परंपरा।