रतलाम। जहां मुक्तिधाम में अपनों को अंतिम विदाई दी जाती है, वहीं रतलाम में साल में एक शाम ऐसा भी आता है, जब यही स्थल दीपों की रोशनी से जगमगा उठता है।
पूर्वजों की स्मृति में चिता स्थलों पर दीप जलाए जाते हैं, रंग-बिरंगी रंगोलियां सजती हैं और आतिशबाजी के साथ दीपोत्सव मनाया जाता है। यह अनूठी परंपरा शहर की सांस्कृतिक पहचान बन चुकी है। इस वर्ष भी 7 नवंबर, शनिवार को त्रिवेणी मुक्तिधाम में यह आयोजन होगा।
श्रद्धा के अनुसार दीपदान करते दीपावली के अवसर पर निभाई जाने वाली इस परंपरा में शहरवासी अपने पूर्वजों के अंतिम विश्राम स्थल पर दीपदान कर उन्हें श्रद्धांजलि देते हैं। शाम होते ही परिवारों का पहुंचना शुरू हो जाता है। महिलाएं और बच्चे भी दीप लेकर पहुंचते हैं। मुक्तिधाम परिसर में रंगोलियां सजाई जाती हैं और आतिशबाजी से माहौल रोशन हो उठता है। शहर के अन्य मुक्तिधामों में भी लोग अपनी श्रद्धा के अनुसार दीपदान करते हैं।
एक छोटी-सी पहल सामूहिक परंपरा में बदल गई इस परंपरा की शुरुआत प्रेरणा संस्था के संस्थापक गोपाल सोनी ने वर्ष 2006 में की थी। तब संस्था के पांच लोगों ने मिलकर श्मशान में दीपदान का आयोजन किया था। धीरे-धीरे शहरवासी इससे जुड़ते गए और एक छोटी-सी पहल सामूहिक परंपरा में बदल गई। आज यह आयोजन पूर्वजों के प्रति सम्मान, स्मृति और पारिवारिक जुड़ाव का प्रतीक बन गया है
पांच लोगों की पहल बनी शहर की परंपरा
वर्ष 2006 में प्रेरणा संस्था ने शुरू किया दीपदान।
मुख्य आयोजन स्थल प्राचीन त्रिवेणी मुक्तिधाम।चिता स्थलों पर दीप, रंगोली और आतिशबाजी।
पूर्वजों को याद कर उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करना।वाघेला समिति मनाएगी वृद्धाश्रमों और गोशालाओं में दीपोत्सव
दीपावली पर्व वाघेला गो सेवा जीव दया समिति के सदस्य वृद्धाश्रमों में वृद्धजनों के साथ मनाएगी। संत आत्मानंद सरस्वती के सानिध्य में समिति शहर के सभी प्रमुख वृद्धाश्रमों, त्रिवेणी स्थित बद्रीनारायण अन्न क्षेत्र तथा गोशालाओं में कार्यरत गोसेवकों को उनकी पसंद का सामूहिक भोज कराएगी। समिति प्रमुख दिनेश वाघेला ने बताया कि समिति हर वर्ष इन वृद्धजनों के बीच दीपावली उत्सव मनाती है ताकि उन्हें त्योहारों पर अकेलापन महसूस न हो। इस दौरान बाबूलाल सिसोदिया, गोविंद सिंह शेखावत, महिला मंडल प्रमुख श्यामा वाघेला, शकुंतला सिसोदिया और आशा भट्ट ने नगर के धर्मपरायण सज्जनों और महिलाओं से आग्रह किया है कि वे 8 नवंबर को सुबह 11 बजे लक्कड़ पीठा स्थित अन्नपूर्णा वृद्ध आश्रम में पहुंचकर इस पर्व पर सेवा का पुण्य लाभ लें।