ओल्ड एज होम्स की बढ़ती संख्या भी यही इशारा करती है कि समाज में बुजुर्गों की स्थिति अधिक अच्छी नहीं है। कुछ ऐसी बातें एक सर्वे में भी सामने आई हैं।
हमारी संस्कृति में बड़े-बुजुर्गों के सम्मान की परंपरा रही है। बचपन में जब कभी बच्चों को अपने से बड़ों से कुछ ऊंची आवाज में बात करते देखा जाता था, तो यही नसीहत दी जाती थी कि उनसे सम्मान से पेश आओ। किंतु बदलते समय और जीवन मूल्यों के कारण अब स्थिति यहां तक पहुंच गई है कि बुजुर्ग हमारे समाज में हाशिए पर जाने लगे हैं। उन्हें फालतू समझा जाने लगा है। ओल्ड एज होम्स की बढ़ती संख्या भी यही इशारा करती है कि समाज में बुजुर्गों की स्थिति अधिक अच्छी नहीं है। कुछ ऐसी बातें एक सर्वे में भी सामने आई हैं। आइए इसके आधार पर जानें कि हमारे समाज में आज बुजुर्गों की क्या स्थिति है...
घर में कोई नहीं देता ध्यान
शादी से पहले जो बेटा काम या ऑफिस से वापस आकर मां-बाप से दिन भर का हाल चाल पूछता था, वही बेटे अब परायों से व्यवहार करते अधिकतर घरों में दिखाई देते है। ऑफिस से घर आने के बाद बच्चे अपनी दुनिया में मस्त होकर जी रहे हैं वे यह भी भूल जाते हैं कि बचपन में उन्ही माता-पिता के बिना उनको चैन नहीं आता था। बेटे अगर शादी शुदा हैं तो अपने परिवार में मस्त और अगर शादी नहीं की है, तो घर आकर मोबाइल और सोशल मीडिया ही जैसे उनका परिवार है।
बढ़ती संख्या, बदलता सामाजिक परिवेश और बदलती पारिवारिक स्थितयों ने परिवार के बुजुर्गों के लिए जिंदगी को और दुश्वार कर दिया है। घर के बुजुर्गों और नए परिवार बसाते बच्चों के बीच एक दूरी-सी पैदा हो गई है। और ये दूरी गांव और छोटे कस्बों से ज्यादा शहरों में देखने को मिलती है। जिंदगी के इस वक्त जब उम्र की शाम होने लगती है, तो अधिकतर घरों में बुजुर्गों की अनदेखी कर दी जाती है, और बेकार का सामान समझ कर या तो घर के कोने में या ओल्ड एज होम में रवाना कर दिया जाता है, बुजुर्गों की अनदेखी उनके लिए मानसिक अवसाद की वजह बन जाती है। इस बेरहम स्थिति के लिए आखिर कौन जिम्मेदार है?
घर ही नहीं बाहर भी स्थिति चिंताजनक
44% बुजुर्गों ने यह कहा कि सार्वजनिक स्थानों पर उनके साथ बुरा व्यवहार किया जाता है।
53% बुजुर्गों का कहना है कि भारतीय समाज बुजुर्गों के साथ भेदभाव करता है। । >
70% बंगलुरू के बुजुर्गों का कहना है कि पार्क में टहलना तक उनके लिए किसी बुरे सपने की तरह होता है।
भारत है 71वें स्थान पर...
वृद्धों के लिए दुनिया की सबसे बेहतरीन और दुनिया की सबसे खराब जगहों की वैश्विक रैंकिंग में स्विटजरलैंड का नाम सबसे अच्छी जगह और भारत का नाम सबसे खराब जगह में शुमार किया गया है। हेल्पेज इंटरनेशनल नेटवर्क ऑफ चैरिटीज की ओर से तैयार ग्लोबल एज वॉच इंडेक्स में 96 देशों में भारत को 71वां स्थान दिया गया।
कानून का सहारा लेने से हिचकते हैं
पूरे संसार में शायद भारत ही एक ऐसा देश है, जहां तीन पीढिय़ां सप्रेम एक ही घर में रहती थीं। आज स्थिति बिलकुल उलट है। ऐसे पीडि़त बुजुर्गो के संरक्षण के लिए कानून है, लेकिन जानकारी के अभाव और बदनामी के डर से बुजुर्ग कानून का सहारा लेने से हिचकते हैं।
बुजुर्गों के स्वास्थ्य की स्थिति भी अच्छी नहीं...
जनगणना के आंकड़ों के अनुसार, 1995 में ग्रामीण भारत में वृद्धों की मृत्यु के तीन सबसे बड़े कारण श्वासनली-शोथ / दमा (25.8 प्रतिशत), दिल का दौरा (13.2 प्रतिशत) और लकवा (8.5 प्रतिशत) रहे हैं। भारत में 10 प्रतिशत से अधिक वृद्ध विषादग्रस्त हैं और इस आयुवर्ग के 40-50 प्रतिशत लोगों को अपने जीवन की संध्या में कभी न कभी मनोचिकित्सीय या मनोवैज्ञानिक की आवश्यकता होती है।
52वें नेशनल सैम्पल सर्वे (1995- 96) के अनुसार उम्रदराज लोगों में दीर्घकालिक रोगी की मौजूदगी बहुत अधिक पाई गई। ग्रामीण क्षेत्रों (25 प्रतिशत) के मुकाबले शहरों इलाकों (55 प्रतिशत) में इस आयुवर्ग के लोगों को ये रोग अधिक थे।
वृद्ध लोगों में सबसे गंभीर रोग था-‘जोड़ों की समस्या’। इससे ग्रामीण इलाकों में 38 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 43 प्रतिशत उम्रदराज लोग प्रभावित थे।ग्रामीण इलाकों में पुरुषों के मकाबले महिलाएं ‘जोड़ों के समस्या’ से ज्यादा ग्रस्त पाई गईं। ग्रामीण इलाकों में 40 और शहरी इलाकों में 35 प्रतिशत उम्रदराज लोग किसी न किसी प्रकार की शारीरिक अक्षमता (दिखने, सुनने व बोलने इत्यादि से संबंधित ) से ग्रस्त पाए गए।
स्रोत- हेल्पेज इंडिया/ वोलंटरी हेल्थ एसोसिएशन ऑफ इंडिया