धर्म और अध्यात्म

Banke Bihari Mandir में क्यों नहीं बजती घंटियां? जानिए इसके पीछे की पौराणिक कथा और मान्यता

Banke Bihari Temple Mystery: बांके बिहारी मंदिर में घंटियां क्यों नहीं बजतीं और हर दो मिनट में पर्दा क्यों बंद होता है? जानिए वृंदावन के प्रसिद्ध मंदिर से जुड़ी पौराणिक मान्यताएं और रोचक परंपराएं।

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Jun 12, 2026
Why Bells Are Not Rung in Banke Bihari Temple
Banke Bihari Mandir: मंगला आरती बांके बिहारी मंदिर (वीडियो सोर्स:www.bihariji.org)

Why Bells Are Not Rung in Banke Bihari Temple: क्या आप जानते हैं ब्रज के केंद्र में स्थित विश्व प्रसिद्ध श्री बांके बिहारी मंदिर के नियम दुनिया के बाकी सभी हिंदू मंदिरों से बिल्कुल जुदा हैं? जहां देश के हर मंदिर में सुबह की शुरुआत मंगला आरती और घंटियों की गूंज से होती है, वहीं ठाकुर बांके बिहारी जी के दरबार में पूरी तरह सन्नाटा पसरा रहता है। यहां न तो घंटियां बजाने की अनुमति है और न ही सुबह-सुबह लाला को नींद से जगाया जाता है। आखिर क्या है इन परंपराओं के पीछे की मान्यता? आइए जानते हैं।

संगीत के अवतार स्वामी हरिदास और वो महाप्रकाश

कहानी शुरू होती है आज से लगभग पांच सदियों पहले, जब वृंदावन कंक्रीट का जंगल नहीं, बल्कि घने और शांत वनों से ढका एक आलौकिक क्षेत्र था। इसी पावन धरा पर संगीत के महानायक और परम भक्त स्वामी हरिदास जी निवास करते थे। कहा जाता है कि जब हरिदास जी तान छेड़ते थे, तो हवाएं थम जाती थीं, पक्षी चहकना भूल जाते थे और पेड़ की डालियां झुक जाती थीं।

एक दिन जब वे अपने प्रिय निधिवन में भजन गा रहे थे, तभी अचानक पूरा वातावरण एक अलौकिक कंपन से भर गया। शिष्यों ने देखा कि सामने एक तीव्र दिव्य प्रकाश प्रकट हुआ और उस रोशनी के बीच साक्षात राधा-कृष्ण मुस्कुरा रहे थे। यह रूप इतना तेजस्वी था कि आम इंसान की आंखें उसे सहन नहीं कर सकती थीं।

तब स्वामी हरिदास जी ने हाथ जोड़कर प्रार्थना की, प्रभु! आपके इस विराट तेज को हर भक्त नहीं देख पाएगा, कृपया कोई सौम्य रूप धारण करें। देखते ही देखते, राधा और कृष्ण एक-दूसरे में विलीन हो गए और वहां प्रकट हुई त्रिभंग मुद्रा (तीन जगह से मुड़ी हुई) में साक्षात बांके बिहारी जी की विग्रह मूर्ति।

ममता का बंधन: क्यों बालक की तरह लाड़ लड़ाते हैं पुजारी?

बांके बिहारी मंदिर में प्रवेश करते ही आपको एक अजीब सी शांति का अहसास होगा। यहां एक भी घंटी नहीं है। इसके पीछे तर्क बेहद भावुक करने वाला है। मंदिर के सेवायत बताते हैं कि बिहारी जी को यहां भगवान नहीं, बल्कि एक छोटे बालक के रूप में पूजा जाता है। भारी घंटियों की आवाज से छोटे बच्चे की नींद या आराम में खलल न पड़े, इसलिए सदियों से यहां घंटियां बजाना वर्जित है।

यही कारण है कि यहां साल में सिर्फ एक बार (जन्माष्टमी के अगले दिन) ही मंगला आरती होती है। मान्यता है कि ठाकुर जी रोज रात को निधिवन में गोपियों संग रास रचाते हैं। रात भर नाचने के बाद जब लाला थक कर भोर में सोता है, तो उसे सुबह जल्दी जगाना ममता के खिलाफ माना जाता है। इसलिए वे आराम से सोकर उठते हैं।

जब बूढ़ी मां के पीछे चल पड़े लाला, और खींच गया वो पर्दा

इस मंदिर का सबसे बड़ा कौतूहल है- हर दो मिनट में ठाकुर जी के आगे पर्दा डालना। इसके पीछे दर्ज इतिहास की एक घटना रोंगटे खड़े कर देने वाली है। सदियों पहले वृंदावन में एक निसंतान और एकाकी बुजुर्ग महिला रहती थी। दुनिया के तानों से थककर वह बिहारी जी के दरबार में आकर बैठ गई। जब उसने ठाकुर जी के बाल रूप को निहारा, तो उसकी आंखों से आंसू बह निकले। उसने मन ही मन ठाकुर जी को अपना बेटा मान लिया और अपनी सारी संपत्ति उनके नाम करने का फैसला किया।

जैसे ही वह महिला मंदिर से बाहर जाने के लिए मुड़ी, एक अजूबा हुआ। लोककथा के अनुसार, बांके बिहारी जी की मूर्ति अपने सिंहासन को छोड़कर उस बुढ़िया के पीछे-पीछे चल पड़ी, जैसे कोई छोटा बच्चा अपनी मां के पल्लू के पीछे भागता है। पुजारियों में हड़कंप मच गया।

उन्होंने भागकर महिला को रोका और ठाकुर जी से मिन्नतें कीं, लाला लौट आओ, पूरे ब्रज को तुम्हारी जरूरत है। बड़ी मुश्किल से मनुहार करके भगवान को वापस आसन पर बैठाया गया। तभी से यह नियम बना कि ठाकुर जी की जादुई और सजीव आंखों में कोई भक्त लगातार न झांके, वरना वे फिर किसी के अगाध प्रेम में बहकर मंदिर छोड़ देंगे। इसीलिए हर दो मिनट पर पर्दा गिराया जाता है।

सुरंगे, नागों का पहरा और वो गायब खजाना

बांके बिहारी मंदिर का नाता सिर्फ चमत्कारों से नहीं, बल्कि रहस्यों से भी है। लोक कथाओं के अनुसार, इस मंदिर के नीचे एक गुप्त सुरंग हुआ करती थी, जो सीधे जयपुर के प्रसिद्ध गोविंद देव जी मंदिर तक जाती थी। मुगल आक्रमणों के समय इसी गुप्त मार्ग से मूर्तियों को सुरक्षित स्थानांतरित किया जाता था। आज के संत इसे भौगोलिक मार्ग नहीं, बल्कि दो सिद्ध पीठों के बीच का एक ऊर्जा पथ (Energy Pathway) मानते हैं।

यही नहीं, मंदिर में एक बंद कमरा भी हमेशा से रहस्य का केंद्र रहा, जिसके बारे में अफवाह थी कि वहां अरबों का खजाना है और उसकी रक्षा इच्छाधारी नाग करते हैं। हालांकि, इतिहास के पन्नों को पलटें तो धनतेरस के मौके पर जब इस कमरे को खोला गया, तो वहां सोने-चांदी के सिक्कों की जगह सिर्फ मिट्टी, धूल और पुराने चांदी के खाली पात्र मिले।

मंदिर के दस्तावेजों के मुताबिक, असली खजाना साल 1926, 1936 और 1971 में हुई तीन बड़ी चोरियों के दौरान पूरी तरह गायब हो गया था। लेकिन ब्रजवासियों का मानना है कि बिहारी जी का असली खजाना तो उनकी वो मुस्कान है, जो हर साल करोड़ों भक्तों को खींचकर वृंदावन ले आती है।

श्री कृष्ण के चरणों के दर्शन सिर्फ एक दिन

बांके बिहारी जी के विग्रह से जुड़ा एक और कड़ा नियम है कि उनके चरण हमेशा वस्त्रों और फूलों से ढके रहते हैं। पूरे 365 दिनों में केवल अक्षय तृतीया के दिन ही भक्तों को ठाकुर जी के चरण कमलों के सीधे दर्शन करने का सौभाग्य मिलता है। मान्यता है कि इस दिन चरणों के दर्शन करने से मनुष्य के सात जन्मों के पाप धुल जाते हैं और घर में कभी धन-धान्य की कमी नहीं होती।

Published on:
12 Jun 2026 03:25 pm