
Gorakhnath Story: भारतीय उपमहाद्वीप के आध्यात्मिक इतिहास में नाथ संप्रदाय और उनके योगियों की महिमा किसी से छिपी नहीं है। देवाधिदेव महादेव के अवतार माने जाने वाले परम प्रतापी योगी मछिंद्रनाथ (Guru Machhindranath) और उनके परम शिष्य बाबा गोरखनाथ के बीच का संवाद केवल एक पौराणिक कथा नहीं, बल्कि मानव जीवन को सही दिशा दिखाने वाला एक जीवंत दर्शन है। आध्यात्मिक गुरु सद्गुरु (Sadhguru) के अपने यूट्यूब चैनल बार बताया कैसे एक मां की नासमझी के कारण कूड़े के ढेर में एक महायोगी का प्राकट्य हुआ और कैसे गुरु के एक वाक्य ने 'कर्म की बासी रोटी' का असली सच दुनिया के सामने रखा।
बात सदियों पुरानी है। महान योगी मछिंद्रनाथ (Guru Machhindranath), जो केवल एक लंगोट में भी किसी सम्राट से अधिक भव्य और ओजस्वी दिखते थे, भ्रमण करते हुए एक संपन्न परिवार के द्वार पर भिक्षा मांगने पहुंचे। घर की महिला ने उन्हें अन्न दान तो किया, लेकिन साथ ही अपनी नि:संतान होने की पीड़ा भी रो दी। तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियों में एक महिला के लिए बांझ होना किसी अभिशाप से कम नहीं था।
योगी मछिंद्रनाथ ने महिला की सच्ची पीड़ा को देखा, अपने झोले से पवित्र विभूति (भस्म) निकाली और कहा, "इसे खा लो, तुम्हें तेजस्वी पुत्र रत्न की प्राप्ति होगी।" महिला पहले तो खुश हुई, लेकिन जब उसने आस-पड़ोस और परिवार के लोगों को यह बात बताई, तो सबने उसका उपहास उड़ाया। लोगों ने कहा, "अरे मूर्ख! कहीं राख खाने से भी बच्चा पैदा होता है?" लोक-लाज और अविश्वास के डर से सहमी उस महिला ने वह पवित्र भस्म अपने घर के पीछे बने कूड़े के एक बड़े गड्ढे (खड्ड) में फेंक दी।
लोककथा के अनुसार, समय का चक्र घूमता रहा। ठीक 12 वर्ष बाद, गुरु मछिंद्रनाथ दोबारा उसी द्वार पर आए और उन्होंने अलख जगाई। महिला बाहर आई, पर वह गुरु को पहचान नहीं सकी। मछिंद्रनाथ ने सीधे पूछा, "कहाँ है तुम्हारा पुत्र? आज उसे 12 वर्ष का हो जाना चाहिए था।" महिला के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसने रोते हुए अपनी भूल स्वीकार की और बताया कि उसने वह भस्म कूड़े के ढेर में फेंक दी थी।
मछिंद्रनाथ ने ग्रामीणों को इकट्ठा किया और उस गड्ढे को खोदने का आदेश दिया। जैसे ही मिट्टी और कूड़ा हटाया गया, वहां का नजारा देखकर सबकी आंखें फटी की फटी रह गईं। कूड़े के उस ढेर के बीच एक देदीप्यमान 12 वर्ष का बालक ध्यानमुद्रा में बैठा था। यही बालक आगे चलकर महायोगी गोरखनाथ कहलाया, जिनका नाम आज भी बड़े आदर और श्रद्धा से लिया जाता है।
कूड़े के ढेर से निकलने के कारण समाज का कोई बंधन बालक गोरखनाथ को रोक नहीं सका और मछिंद्रनाथ उन्हें साधना के मार्ग पर ले गए। गोरखनाथ अत्यंत अनुशासित और समर्पित शिष्य थे, लेकिन एक दिन कठिन साधना से थककर उनके मन में एक संशय उठा। उन्होंने अपने गुरु से पूछा,
भगवन! मैं इतनी कठोर साधना और तपस्या कर रहा हूं, फिर भी मुझे वह सहज आनंद नहीं मिल रहा। दूसरी ओर, संसार के आम लोग बिना किसी मेहनत के ऐशो-आराम और आनंद में डूबे हैं। मेरे साथ ही ऐसा कठिन मार्ग क्यों?"
गुरु मछिंद्रनाथ ने मुस्कुराते हुए जो उत्तर दिया, वह आज के हर इंसान के लिए आंखें खोलने वाला है। उन्होंने कहा:
पिछले जन्म का संचित पुण्य: "वत्स जिन लोगों को तुम बिना मेहनत के सुखी देख रहे हो, वे दरअसल बासी भोजन (पुराना पका हुआ खाना) खा रहे हैं। यह उनके पिछले जन्मों के अच्छे कर्मों का फल है, जिसे वे आज भुगत रहे हैं।
आज का कर्म ही कल का भविष्य: यदि वे इस जन्म में नए कर्म (नया भोजन) नहीं पकाएंगे, तो कल वे भूखे मरेंगे। उनका संचित पुण्य खत्म होते ही वे नीचे गिर जाएंगे।
मुफ्त की चीज का आदर नहीं: जिन्हें चीजें बिना संघर्ष के मुफ्त में मिल जाती हैं, वे अक्सर उसकी कीमत नहीं समझते। जैसे अमीर घर में पैदा हुआ बच्चा भूख का दर्द नहीं जानता और संपत्ति को नष्ट कर देता है, वैसे ही पूर्व पुण्यों पर जीने वालों में उद्देश्य की दृढ़ता (Integrity of purpose) नहीं होती।
गुरु ने गोरखनाथ की पीठ थपथपाते हुए कहा कि तुम्हारा पुराना प्रारब्ध भले ही कूड़ा था, लेकिन तुम्हें आज अपनी मेहनत से नया और ताजा भाग्य लिखना है।
आज के दौर में जब लोग इंस्टेंट सक्सेस या बिना मेहनत के सब कुछ पा लेने की होड़ में लगे हैं, तब गुरु मछिंद्रनाथ का यह बासी भोजन और कर्म का सिद्धांत (Karma Theory) बेहद प्रासंगिक हो जाता है। यह कहानी हमें सिखाती है कि वर्तमान में किया गया पुरुषार्थ ही स्थायी होता है।
गोरखपुर और गोरखनाथ मंदिर: उत्तर प्रदेश का प्रसिद्ध शहर गोरखपुर का नाम इन्हीं महायोगी गोरखनाथ के नाम पर पड़ा है। यहां का गोरखनाथ मंदिर आज भी देश के सबसे बड़े आध्यात्मिक और सामाजिक केंद्रों में से एक है, जिसके पीठाधीश्वर वर्तमान में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हैं।
हठयोग के प्रणेता: बाबा गोरखनाथ हठयोग (Hatha Yoga) परंपरा के प्रमुख योगियों में गिने जाते हैं। उन्होंने प्राणायाम, आसन और चक्र साधना को जन-जन तक पहुंचाया।
समानता का संदेश: नाथ संप्रदाय ने हमेशा जाति-पाति और ऊंच-नीच के भेदभाव का विरोध किया। कूड़े के ढेर से गोरखनाथ का प्रकट होना प्रतीकात्मक रूप से यह भी दर्शाता है कि अध्यात्म और महानता किसी कुल या महलों की दासी नहीं होती, वह कहीं भी प्रस्फुटित हो सकती है।