
Hindu Gods Vahanas: सनातन धर्म में आदि काल से ही देवी-देवताओं के साकार रूप की पूजा की परंपरा रही है। भगवान के अलौकिक स्वरूप, उनके हाथ के अस्त्र-शस्त्र और उनके आभूषणों से तो हम सब अच्छी तरह वाकिफ हैं, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि हर भगवान की तस्वीर या मूर्ति के साथ एक खास पशु या पक्षी क्यों दिखाई देता है?
भगवान शिव के साथ नंदी, मां दुर्गा के साथ शेर, और भगवान विष्णु के साथ गरुड़ सिर्फ एक सवारी मात्र नहीं हैं। देवी-देवताओं ने इन बेजुबान प्राणियों को अपना वाहन चुनकर पूरी सृष्टि को एक ऐसा मानसिक और आध्यात्मिक संदेश दिया है, जो आज के समय में पर्यावरण को बचाने के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है। आइए जानते हैं इन दिव्य सवारियों के पीछे छिपे अनसुने रहस्यों को।
भगवान भोलेनाथ की सवारी है बैल, जिन्हें हम प्रेम से 'नंदी' कहते हैं। शिव पुराण के अनुसार, नंदी साधारण जीव नहीं बल्कि शिव के गण हैं। प्राचीन कामशास्त्र के रचनाकार भी नंदी ही थे। बैल का स्वभाव आमतौर पर बेहद शांत, सीधा और समर्पित होता है। वह दिन-रात बिना किसी भौतिक इच्छा के कर्म करता रहता है। लेकिन जब उसे क्रोध आता है, तो वह सिंह से भी टकराने का माद्दा रखता है। नंदी के चार पैर धर्म के चार स्तंभों क्षमा, दया, दान और तप के प्रतीक हैं। महादेव की यह सवारी सिखाती है कि इंसान चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, उसे हमेशा शांत और सहज रहना चाहिए।
आदिशक्ति मां दुर्गा का वाहन वनराज शेर है। देवी भागवत के अनुसार, शेर जंगल का सबसे शक्तिशाली प्राणी होने के बावजूद अपनी ऊर्जा को व्यर्थ नष्ट नहीं करता, वह केवल आवश्यकता पड़ने पर ही शिकार करता है। शेर हमेशा अपने कुनबे (संयुक्त परिवार) के साथ रहता है।
मां दुर्गा का यह वाहन इंसानों को संदेश देता है कि परिवार के मुखिया को सबको साथ लेकर चलना चाहिए और अपनी शक्ति को व्यर्थ के विवादों में गंवाने के बजाय घर को सुखी और सुरक्षित बनाने में लगाना चाहिए।
सृष्टि के पालनहार भगवान श्रीहरि विष्णु गरुड़ पर सवार होते हैं। ऋषि कश्यप और देवी विनिता के पुत्र गरुड़ आकाश की अनंत ऊंचाइयों पर उड़ने के बाद भी धरती के छोटे से छोटे जीव पर नजर रखने की अद्भुत क्षमता रखते हैं। वे सांपों के शत्रु और विष तथा आतंक को नष्ट करने वाले माने जाते हैं।
नारायण का गरुड़ पर बैठना यह दिखाता है कि जगत के पालनकर्ता की नजर हर जीव पर है। यह इंसानों को हमेशा जागरूक रहने और अपने भीतर की बुराइयों का अंत करने की प्रेरणा देता है।
चूहे का स्वभाव हर चीज को कुतरना और नुकसान पहुंचाना होता है। यह 'कुतर्की' लोगों का प्रतीक है जो हर काम में अड़ंगा डालते हैं। बुद्धि के देवता गणेश जी का चूहे पर बैठना यह दर्शाता है कि उन्होंने स्वार्थ और कुतर्क को अपने नीचे दबाकर जन कल्याण को सर्वोपरि माना है।
वहीं, धन की देवी लक्ष्मी जी का वाहन उल्लू है, जो एक निशाचर (रात में जागने वाला) पक्षी है। उल्लू अपने भोजन के लिए लगातार क्रियाशील रहता है। यह हमें सिखाता है कि जो व्यक्ति दिन-रात ईमानदारी से मेहनत करता है, लक्ष्मी जी की कृपा उसी पर बरसती है। विद्या की देवी सरस्वती का वाहन हंस है, जो अपनी 'नीर-क्षीर' विवेक (दूध का दूध, पानी का पानी करने की क्षमता) के लिए जाना जाता है। ज्ञान हमेशा इंसान के भीतर पवित्रता और सामाजिकता का विकास करता है।
मां पार्वती और बाघ: मां दुर्गा का वाहन जहां शेर है, वहीं मां पार्वती का वाहन बाघ है। बाघ अदम्य साहस, क्रूरता और आक्रामकता का प्रतीक है। बाघ की एक दहाड़ के आगे सब शांत हो जाते हैं, जो मां पार्वती के तेज को प्रदर्शित करता है।
सूर्य देव का रथ: भगवान सूर्य सात घोड़ों के रथ पर सवार हैं। ये सात घोड़े शक्ति, स्फूर्ति और समय की गति के प्रतीक हैं, जो हमें बिना रुके सदैव आगे बढ़ते रहने का संदेश देते हैं।
यमराज का भैंसा: मृत्यु के देवता यमराज भैंसे पर चलते हैं। भैंसा एक सामाजिक प्राणी है जो एकता में रहता है, लेकिन उसका भयानक रूप और असीम शक्ति अमंगल और काल के कठोर सत्य को दर्शाती है।
देवराज इंद्र का ऐरावत: समुद्र मंथन से निकला चार दांतों वाला सफेद हाथी 'ऐरावत' इंद्र का वाहन है। यह विशालकाय जीव असीम शांति, बुद्धिमत्ता और ऐश्वर्य का प्रतीक है।
चाहे मां गंगा का वाहन मगरमच्छ हो, कार्तिकेय का चंचल मयूर (मोर) हो, या कुबेर का नेवला—हमारे ऋषि-मुनियों ने वेदों और पुराणों में प्राकृतिक शक्तियों को देवताओं का रूप दिया। इन वाहनों के माध्यम से मनुष्य को यह पाठ पढ़ाया गया कि हर जीव इस पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। जीवों को मारना या प्रकृति के साथ छेड़छाड़ करना पूरी मानव जाति के लिए भयानक साबित हो सकता है। इसलिए, इन पशु-पक्षियों के प्रति सहिष्णुता रखना और उनकी रक्षा करना ही सच्ची ईश्वर सेवा है।