धर्म और अध्यात्म

Pradosh Vrat 2026: 12 और 27 जून को पड़ेंगे व्रत, जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और महत्व

Pradosh Vrat June 2026: जून 2026 में प्रदोष व्रत 12 और 27 जून को रखा जाएगा। भगवान शिव को समर्पित इस व्रत में भक्त उपवास और पूजा-अर्चना करते हैं। जानें तिथि, पूजा विधि, उपवास नियम और धार्मिक महत्व।

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Jun 02, 2026
Pradosh Vrat Katha
Pradosh Vrat 2026 : शुक्र प्रदोष व्रत से सौभाग्य में वृद्धि और संतान सुख की प्राप्ति होने की मान्यता है (फोटो सोर्स : AI@chatgpt)

Pradosh Vrat 2026: जून 2026 में प्रदोष व्रत 12 जून और 27 जून को रखा जाएगा। यह व्रत भगवान शिव को समर्पित माना जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार त्रयोदशी तिथि पर पड़ने वाले इस व्रत में भक्त उपवास रखकर शिव-पार्वती की पूजा करते हैं। 12 जून शुक्रवार को होने के कारण इसे भृगु वारा प्रदोष व्रत (Pradosh Vrat 2026) कहा जाता है, धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भृगु वारा प्रदोष व्रत को सुख-समृद्धि और कल्याणकारी फल प्रदान करने वाला माना जाता है।

प्रदोष व्रत का धार्मिक महत्व

हिंदू पौराणिक मान्यताओं और स्कंद पुराण के अनुसार, 'प्रदोष' का अर्थ संध्याकाल या रात के शुरुआती समय से है। माना जाता है कि इस त्रयोदशी तिथि पर शाम के समय भगवान भोलेनाथ अपनी अर्धांगिनी माता पार्वती के साथ अत्यंत प्रसन्न, आनंदित और उदार मुद्रा में होते हैं। इस समय जो भी भक्त सच्चे मन से उनकी आराधना करता है, धार्मिक मान्यता है कि सच्चे मन से की गई शिव आराधना से भक्तों को मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है। कुछ धार्मिक ग्रंथों में प्रदोष काल में दीपदान को विशेष पुण्यदायक बताया गया है।

प्रदोष व्रत 2026 शुभ मुहूर्त (12 जून 2026)

विवरणजानकारी
व्रत का नामशुक्र प्रदोष व्रत
माहजून 2026
पक्षशुक्ल पक्ष
तिथित्रयोदशी
व्रत की तारीख12 जून 2026 (शुक्रवार)
त्रयोदशी तिथि प्रारंभ12 जून 2026, शाम 07:36 बजे
त्रयोदशी तिथि समाप्त13 जून 2026, शाम 04:07 बजे
पूजा एवं व्रत का दिन12 जून 2026
पूजा का आधारप्रदोष व्रत की पूजा संध्याकाल में की जाती है
प्रदोष व्रत का प्रकारशुक्र प्रदोष व्रत
धार्मिक मान्यताशुक्र प्रदोष व्रत से सौभाग्य में वृद्धि और संतान सुख की प्राप्ति होने की मान्यता है

इसके बाद जून महीने का दूसरा प्रदोष (Pradosh Vrat 2026) व्रत 27 जून 2026 (शनिवार) को रखा जाएगा, जिसे 'शनि प्रदोष' कहा जाता है।

प्रदोष व्रत में उपवास के नियम

कोई भी श्रद्धालु इस महाव्रत को रख सकता है। स्कंद पुराण में इस व्रत को रखने के दो तरीके बताए गए हैं:

24 घंटे का कड़ा उपवास: इसमें भक्त दिन और रात पूरी तरह निराहार रहते हैं और रात में जागरण करते हैं।

संध्याकाल तक उपवास: इसमें सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक उपवास रखा जाता है और शाम को शिव पूजा करने के बाद व्रत खोला जाता है। देश के कुछ हिस्सों में इस दिन भगवान शिव के 'नटराज' स्वरूप की पूजा का भी विधान है।

प्रदोष व्रत की पूजा विधि

तैयारी: सूर्यास्त से करीब एक घंटे पहले स्नान कर साफ वस्त्र धारण करें।

कलश स्थापना: पूजा स्थान पर दर्भा घास पर कमल का चित्र बनाकर जल से भरा कलश स्थापित करें। भगवान शिव, माता पार्वती, गणेश जी, कार्तिकेय और नंदी महाराज की संयुक्त पूजा करें।

शिवलिंग का अभिषेक: शिवलिंग को दूध, दही और घी जैसी पवित्र सामग्रियों से स्नान कराएं। शिव पूजा में बेलपत्र अर्पित करने का विशेष महत्व माना जाता है।

मंत्र और कथा: पूजा के दौरान प्रदोष व्रत कथा सुनें या शिव पुराण की कहानियां पढ़ें। इसके बाद महामृत्युंजय मंत्र का 108 बार जाप करें।

समापन: पूजा के बाद कलश का पवित्र जल ग्रहण करें, माथे पर भस्म लगाएं और पास के शिव मंदिर जाकर दर्शन जरूर करें।

अस्वीकरण (Disclaimer): इस लेख में दी गई जानकारी केवल सामान्य सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए है। यहाँ दी गई ज्योतिष, वास्तु या धार्मिक जानकारी मान्यताओं और विभिन्न स्रोतों पर आधारित है। हम इसकी पूर्ण सटीकता या सफलता की गारंटी नहीं देते हैं। किसी भी उपाय, सलाह या विधि को अपनाने से पहले संबंधित क्षेत्र के प्रमाणित विशेषज्ञ या विद्वान से परामर्श अवश्य लें।