संभल के भूड़ इलाके में है कैला देवी का प्राचीन मंदिर मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ भी लगा चुके हैं हाजिरी संभल से दो बार सांसद रहे हैं मुलायम सिंह यादव
संभल। उत्तर प्रदेश या यूं कहें कि देश के सबसे बड़े राजनीतिक परिवार का संभल प्रेम ऐसे ही नहीं है। इसके पीछे की वजह वहां का कैला देवी मंदिर है। लोकसभा चुनाव के तीसरे चरण के चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश मुख्यमंत्री ने भी जनसभा से पहले प्राचीन कैला देवी के मंदिर हाजिरी लगाई थी। उन्होंने पिछली सरकारों पर निशाना साधते हुए कैला देवी मंदिर के सौंदर्यीकरण का मुद्दा भी उठाया था। कैला देवी को यदुवंश की कुलदेवी कहा जाता है। यादवों के लिए इस मंदिर का काफी महत्व है। सोमवार को माता के दर्शन करना काफी शुभ माना जाता है।
पूरे देश में हैं दो मंदिर
पूरे देश में कैला देवी के दो ही मंदिर हैं। इनमें से एक राजस्थान में और दूसरा संभल के भूड़ इलाके में है। इस मंदिर का काफी तहत्व है, खासतौर से यादवों के लिए। कहा जाता है कि नवरात्र में यहां एक शेर देवी के दर्शन के लिए आता है। उस दौरान मंदिर में भक्तों का सैलाब उमड़ता है। यहां पर एक बरगद का पेड़ भी है, जो करीब 700 साल पुराना बताया जाता है। सोमवार को यहां पर काफी भक्त देवी के दर्शन के लिए आते हैं।
यह है मान्यता
मान्यता है कि हजारों साल पहले गांव के चारों ओर घना जंगल था। गांव से कुछ दूर जंगल में माता की पिंडी अपने-आप निकली थी। वहां पर महाराज शीतलादास ने छोटा मठ स्थापित करा दिया था। इसके बाद मां कैलादेवी धाम के नाम से वह जगह प्रसिद्ध हो गई थी। इसके चारों ओर गंगा का पानी आने का खतरा रहता था, जिस कारण कम लोग ही यहां तक आते थे। इसे देखते हुए 1960 में बाबा रत्नगिरि महाराज ने भव्य मंदिर का निर्माण कराया। साथ ही मंदिर परिसर में भी कुआं बनवाया गया। इसके बाद वहां भक्तों की संख्या में बढ़ोतरी होने लगी।
कैला देवी में है आस्था
कहा जाता है कि इस मंदिर ने समाजवादी पार्टी (सपा) के संस्थापक मुलायम सिंह यादव का भाग्य बदल दिया था। उनका संभल से विशेष प्रेम जगजाहिर है। पूरे यादव परिवार को कैला देवी में काफी आस्था है। संभल मुस्लिम और यादव बहुल सीट है। यहां यादव परिवार का दबदबा रहा है। इसे कैला देवी का आशीर्वाद ही माना जाता है। 1992 में सपा की स्थापना करने वाले मुलायम सिंह 1998 के लोकसभा चुनाव में यहां से उतरे ताे डेढ़ लाख से ज्यादा वोटों से जीत गए। 1999 में भी उन्होंने जीत हासिल की। इसके बाद 2004 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने चचेरे भाई रामगोपाल यादव को यहां से चुनाव लड़ाया। प्रो. रामगोपाल ने यहां से रिकॉर्ड मतों से जीत हासिल की थी। 2019 के लोकसभा चुनाव में भी यहां से यादव परिवार के ही किसी शख्स को चुनाव लड़ाने का प्रस्ताव भेजा गया था लेकिन टिकट डॉ. शफीकुर्रहमान बर्क को दे दिया गया था।
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