राजस्व विभाग ने नक्शा नहीं होने से सीमांकन पर नहीं दी अपनी फील्ड बुक, अमान्य है ऐसा सीमांकन जिस तरह जमीन सौंपने प्रतिवेदन दिया वैसी जमीन राजस्व नक्शे में होती नहीं वन क्षेत्र को खत्म करने के खेल में शामिल नजर आ रहे खुद वन विभाग के अफसर
सतना. प्रभु श्री राम की कर्मभूमि चित्रकूट में अब वन क्षेत्र सुरक्षित नहीं रहने वाले हैं। क्योंकि इसकी रक्षा का जिम्मा जिस वन अफसरों पर है वही अपने दायित्वों से विमुख होते नजर आ रहै है। चित्रकूट के रजौला इलाके में जहां सघन वन क्षेत्र है अब उसे राजस्व भूमि बताते हुए वन विभाग खुद मनमानी नाप कर निजी हाथों में सौंपने को बेताब है। हद तो यह है कि अभी यह जमीन कौन सी है यह खुद राजस्व विभाग को भी पता नहीं है, लेकिन वन विभाग अपने कंपार्टमेंट को ही राजस्व का नक्शा मानते हुए निजी लोगों को सौंपने का प्रतिवेदन तैयार कर भेज चुका है। जबकि यहां नक्शा गायब होने के कारण राजस्व विभाग ने अभी तक इस जमीन की फील्ड बुक तैयार करने से हाथ खड़े कर दिया है।
यह है मामला
अवधूत आश्रम प्रबंधन ने आश्रम से लगे जंगल जो कि घना वन क्षेत्र है उसकी 79 एकड़ जमीन को राजस्व भूमि बताते हुए अपनी जमीन होने का दावा किया है। इस दावे पर वन विभाग तुरंत राजी होते हुए फारेस्ट कंपार्टमेंट को ही राजस्व भूमि बता कर निजी भू-स्वामी को देने का प्रतिवेदन भेज दिया। इस मामले में सतना दौरे पर चित्रकूट पहुंचे प्रदेश के वन मंत्री ने भी तेजी से मामला निपटाने का निर्देश डीएफओ को देकर गए हैं। हालांकि इन निर्देशों के पहले मंत्री विजय शाह अवधूत आश्रम पहुंच कर उनके कार्यक्रम में शामिल हुए हैं। जानकारी तो यह भी है कि इसके बाद वे चित्रकूट से बनारस भी गये जहां अवधूत आश्रम का मुख्यालय है।
इस तरह समझें मामले को
जब भी कोई राजस्व भूमि का दावा किया जाता है तो राजस्व अमला उस जमीन का सीमांकन करता है। सीमांकन के लिये उस जमीन का नक्शा होना अनिवार्य होता है। सीमांकन के बाद राजस्व अमला इस सीमांकित जमीन की फील्ड बुक तैयार करता है। जिसके आधार पर यह निर्धारित होता है कि यह जमीन संबंधित की है। घने वन क्षेत्र में निजी राजस्व भूमि का जो दावा किया जा रहा है उसके लिये संयुक्त सीमांकन के आदेश दिये गए थे। जिसमें वन विभाग और राजस्व विभाग को संयुक्त रूप से सीमांकन करना था। लेकिन राजस्व विभाग के अधिकारियों ने यहां का राजस्व नक्शा न होने की बात कहते हुए खुद को सीमांकन से दूर रखा। यही वजह है कि यहां के सीमांकन की कोई राजस्व फील्ड बुक नहीं बनाई गई। बिना फील्ड बुक के राजस्व जमीन का निर्धारण ही नहीं माना जाएगा।
कंपार्टमेंट को ही बता दिया राजस्व आराजी
खेत को बाड़ ही खा रही है यह कहावत यहां चरितार्थ हो रही है। वन विभाग खुद अपनी वन भूमि को छोड़ने पर आमादा है। बिना राजस्व जमीन निर्धारण के ही वन विभाग ने खुद ही अपने कंपार्टमेंट को राजस्व आराजी नंबर बताते हुए आवेदक की अधिपत्य की भूमि बताया और अग्रिम कार्यवाही के लिये प्रतिवेदन भेज दिया।
बिना नक्शे के यह कैसे निर्धारित किया कि यहां है आराजी
इस मामले में संबंधित नायब तहसीलदार ने बताया कि संबंधित आराजी का राजस्व विभाग के पास नक्शा नहीं है। बिना नक्शे के यह तय नहीं किया जा सकता है कि यह भूमि कहां और किस आकार की है। हालांकि राजस्व अभिलेखों में यह आराजी दर्ज है। लेकिन बिना नक्शे के इसका चिन्हांकन नहीं हो सकता है। इस लिये इसके संयुक्त सीमांकन में हमने कोई फील्ड बुक नहीं बनाई है। वन विभाग ने हमसे सिर्फ कंपार्टमेंट निर्धारण की बात कही थी।
यहीं का नक्शा क्यों गायब हुआ?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस 79 एकड़ सघन वन वाली जिस जमीन में निजी भूमि का दावा है उसी क्षेत्र का नक्शा गायब क्यों है? चित्रकूट में कई ऐसे मामले है जहां नक्शे ही बदल दिये गये हैं और अब वे जांच में सामने आते जा रहे हैं। ऐसे में इस जमीन का नक्शा गायब होना एक बड़ा खेल समझ में आ रहा है। इसी तरह का वन भूमि से लगी जमीन में राजस्व भूमि बताने का एक बड़ा खेल परिक्रमा में सामने आ चुका है। जिसमें वन भूमि को निजी राजस्व भूमि साबित कर बड़ा खेल किया गया था। अब वह जमीने जांच के बाद बदल गई हैं। लिहाजा आशंका जताई जा रही है कि यहां भी कुछ वैसा ही खेल किया गया है।