water crisis in shivpuri : तपती दोपहरी में खोंगरो की तलहटी में की जाती है पानी की यहां तलाश। नाले के पास बनाए दो-बाई-दो फीट गहरे गड्ढे में रिसकर आता है पानी। गड्ढे में उतरकर पानी भरते हैं लोग। कड़ी जद्दोजहद के बाज बुझती है यहां सूखे कंठ की प्यास।
संजीव जाट की रिपोर्ट
water crisis in shivpuri :राजस्थान की सीमा ( Rajasthan Border ) से सटे ग्राम में 45 डि.ग्री तापमान ( Extreme heat ) के बीच पानी के लिए जिस प्रकार कठिनाइयों से जूड़ी सूचना लंबे समय से सामने आ रही थी उसकी जमीनी हकीकत जानने पत्रिका की टीम खुद मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले की बदरवास तहसील ( Badarwas Tehsil ) के अंतर्गत आने वाले ग्राम बराईखेड़ा रेटहया (टेकू) बस्ती पहुंची। मालूम हुआ कि यहां हालात बेहद निंदनीय है और हकीकत में पानी के कोई साधन नहीं है।
हालात ये है कि यहां एक हैंडपंप और कुआ है, लेकिन दोनों में पानी सूख चुका है। गांव में रहने वाले परिवारों के ज्यादातर पुरुष मजदूरी करने राजस्थान और गुजरात गए हैं और परिवार की महिलाएं व बच्चे तलहटी में बनाए गए खोंगारो (गड्ढों) में टकटकी लगाए बैठी हैं कि उसमें पानी इकट्ठा हो और वो अपने सूखे कंठ की प्यास बुझा सकें।
बदरवास विकासखंड के अंतर्गत आने वाले राजस्थान की सीमा से लगे बदरवास जनपद की ग्राम पंचायत सालोन की आदिवासी बस्ती बराईखेड़ा रेटहया (टेकू) बस्ती में जब पत्रिका की टीम पहुंची तो रोटी से ज्यादा यहां लोगों में पानी की चिंता नजर आई। चूंकि इस आदिवासी बस्ती के लोगों को हर साल पानी की समस्या से इसी तरह जूझना पड़ता है और वो छोटे-छोटे गड्ढों को खोदकर उनका दूषित पानी पीने को मजबूर हैं।
गांव के लोगों ने खोंगरो में जो गड्ढा पानी के लिए खोदा है, उसमे अलग-अलग परिवारों का समय निर्धारित है कि कब कौन उक्त नाले में बने खोंगरे में से पानी भरेगा। टेकू के आदिवासियों की हर रोज सुबह से ही पानी के लिए जंग शुरू हो जाती है। गांव से करीब डेढ़ किलो मीटर दूर खोंगरों के बीच सूखे पड़े नाले में जगह-जगह गड्ढे खोदकर उसमें रिसकर आने वाला गंदा पानी को छानकर पीना पड़ रहा है।
बस्ती से डेढ़ किलो मीटर दूर करीब आधा किमी एरिया में जगह-जगह पानी के लिए गड्ढे खुदे हुए हैं। नाले की तलहटी से रिसकर आने वाले पानी का इस्तेमाल यहां के लोग करते हैं। जो गड्ढा सूख जाता है उसे छोड़कर लोग दूसरा गड्ढा खोदते हैं, ताकि उससे उन्हें पानी मिल सके। जब इन सभी गड्ढों में भी इन लोगों को पर्याप्त पानी नहीं मिलता तो इन्हें 5 किलो मीटर दूर से पानी लेने निकल पड़ते हैं।
आजादी के 76 साल बाद भी आदिवासी परिवार नाले में खोंगरो में गड्डे खोदकर दूषित पानी पी रहे हैं, जबकि सरकार उनके विकास के बड़े-बड़े दावे कर रही है। यदि शासन-प्रशासन इन परिवारों को सच में ही पानी देना चाहता है तो जिस नाले के रिसाव से गड्ढों में पानी आ रहा है, वहां पर यदि चेक डैम बना दिए जाएं या पानी रोकने की अन्य कोई संरचना बन जाए, तो गांव के कुआं व हैंडपंप में भी पानी रहेगा।
बता दें कि इस गांव में 100 परिवार रहते हैं। यहां लोगों की कुल आबादी 700 है। हैानी की बात ये है कि इतने लोगों के लिए यहां सिर्फ जल स्त्रोत के रूप में 1 हैंडपंप है, लेकिन वो भी बंद पड़ा है। इसके अलावा एक कुआं भी है, लेकिन वो भी सूख चुका है।
बराईखेड़ा रेटहया (टेकू) में रहने वाली अनीता आदिवासी का कहना है कि सुबह से एक चिंता हो जाती है कि आज पानी की प्यास बुझाने के लिए कितनी जद्दोजहद करनी होगी। हम पास ही के नाले के खोंगरो में गड्डे खोदकर उसमें जो पानी एकत्रित होता उसी को पीने को मजबूर हैं। ये पानी भी इतना दूषित है कि गांव के अदिकतर लोग अकसर बीमार ही रहते हैं। इनमें बच्चों और बुजुर्गों की संख्या अधिक है।
मामले को लेकर शिवपुरी जिला पंचायत के सीईओ उमराव मरावी का कहना है कि मामला संज्ञान में आया है। स्थिति अति गंभीर है। हम पीएचई की टीम को भेजकर पता करवाते हैं और उनकी समस्या के निराकरण के लिए हर संभव प्रयास करेंगे।
वहीं, सालोन से सरपंच प्रतिनिधि महेंद्र गुर्जर का कहना है कि अगर इस स्थान पर चैकडेम बन जाए और बोरिंग हो जाएं तो पाइप लाइन बिछाकर ग्रामीणों को आसानी से पानी दिया जा सकता है। लेकिन इस भीषण गर्मी में गड्ढे खोदकर लोगों को पीने के लिए पानी मिल पा रहा है। ये पानी बेहद गंदा है। मैने ये मांग पहले भी रखी थी। इस और ध्यान देना चाहिए।