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उदयपुर…… हार भी नहीं तोड़ पाई हौसला…दूजी नहीं पांचवीं बार फिर तैयार…कतार में पत्नी-बेटी भी दावेदार

नगर निगम चुनाव में भाजपा-कांग्रेस के कई पुराने चेहरे हार के बावजूद फिर टिकट की दौड़ में हैं, जबकि पत्नी-बेटी समेत परिवार के सदस्यों की दावेदारी ने मुकाबला रोचक बना दिया है।अब टिकट का फैसला अनुभव के साथ वार्ड, आरक्षण, सामाजिक समीकरण और जीत की संभावनाओं को ध्यान में रखकर होगा।
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Aug 28, 2026
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उदयपुर. नगर निगम चुनाव में नामांकन प्रक्रिया शुरू होते ही भाजपा और कांग्रेस में टिकट को लेकर आखिरी दौर की खींचतान तेज हो गई है। दोनों दलों के पैनल में नए चेहरों के साथ ऐसे पुराने पदाधिकारी, कार्यकर्ता भी शामिल हैं, जो दूसरी से लेकर पांचवीं बार तक चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं। पिछली हार भी कई दावेदारों का हौसला नहीं तोड़ पाई। वे फिर टिकट की कतार में हैं। इस बार सबसे दिलचस्प तस्वीर महिला और पारिवारिक दावेदारी की है। आरक्षण बदलने से जिन नेताओं के लिए अपने वार्ड से रास्ता बंद हुआ, उनमें कुछ ने पत्नी, बेटी या परिवार के दूसरे सदस्य को आगे कर दिया है। यानी टिकट की राजनीति में अब खुद नहीं तो परिवार का विकल्प भी मजबूती से सामने आया है। महापौर पद सामान्य-खुला होने से पुराने पार्षदों और अनुभवी नेताओं की सक्रियता ने मुकाबले को और रोचक बना दिया है।

भाजपा: अनुभव से अलग 'परिवार' भी ठोक रहे ताल

भाजपा के पैनल में लंबे चुनावी अनुभव वाले कई चेहरे हैं। पारस सिंघवी पांचवीं बार टिकट की दावेदारी कर रहे हैं। मनोहरलाल चौधरी चौथी बार मैदान में उतरने की तैयारी में हैं, जबकि विजय आहूजा और हंसा माली तीसरी बार टिकट की मांग कर रहे हैं। प्रमोद सामर, विद्या भावसार, भरत जोशी, मुकेश शर्मा, अरविंद जारोली, महेंद्रसिंह शेखावत, नानालाल बया और छोगालाल भोई दूसरी बार टिकट के दावेदार हैं। हंसा माली तीन बार पार्षद रह चुकी हैं, जबकि छोगालाल भोई हालिया बोर्ड में पार्षद रहे हैं। ऐसे में पार्टी के सामने अनुभव को तरजीह देने और नए चेहरों को मौका देने के बीच संतुलन की चुनौती है। महिलाओं और परिवार की दावेदारी ने इस तस्वीर को और खास बना दिया है। वेणीराम सालवी ने अपनी बेटी, कमल मेहता ने पत्नी के लिए टिकट मांगा है। शिल्पा पामेचा और उनके पति दीपक दोनों ने दावेदारी पेश की है। यानी एक ही परिवार से दो संभावित नाम सामने आने का मामला भी पार्टी के सामने है।

कांग्रेसः हार के बाद भी मैदान नहीं छोड़ा

कांग्रेस में भी पुराने चेहरों के साथ पिछली हार के बावजूद दोबारा मैदान में उतरने वालों की संख्या कम नहीं है। हर्षवर्धनसिंह , हितांशी शर्मा अरुण टांक, धर्मेश मालवीय, शंकर चंदेल, भूपेंद्र शर्मा, मुजफ्फर हुसैन, पंकज पालीवाल और राममूर्ति धाबाई ने दूसरी बार टिकट मांगा है। विजय शंकर कुमावत और दिनेश भोई तीसरी बार टिकट की कोशिश में हैं। खास बात यह है कि दोनों दो बार की चुनावी कोशिशों में जीत हासिल नहीं कर सके थे। इसके बावजूद उन्होंने इस बार फिर दावेदारी की है। कांग्रेस जिलाध्यक्ष फतहसिंह राठौड़ भी टिकट की दौड़ में हैं। वे चार चुनाव लड़ चुके हैं, दो बार पार्षद रहे और एक चुनाव में हार का सामना किया। पूर्व पार्षद हिदातुल्ला खां भी फिर मैदान में उतरने के इच्छुक हैं।

यहां भी परिवार आगे आया, पत्नी के लिए टिकट की मांग

कांग्रेस में भी परिवार के जरिये राजनीतिक वापसी की तस्वीर साफ दिखाई दे रही है। पूर्व पार्षद मोहसिन खां ने पत्नी के लिए टिकट मांगा है। राकेश खोखावत और विक्रम खटीक ने भी अपनी पत्नियों के लिए दावेदारी की है। श्यामसुंदर गुर्जर ने टिकट मांगा है, जबकि उनकी पत्नी मोनिका गुर्जर पहले पार्षद रह चुकी हैं। पूर्व पार्षद और पुराने राजनीतिक परिवारों की यह सक्रियता बताती है कि आरक्षण और बदले वार्डों के बीच राजनीतिक नेटवर्क बचाए रखने के लिए परिवार को भी विकल्प बनाया जा रहा है। हार के बाद भी वापसी की कोशिश करने वालों में नजमा मेवाफरोश का नाम भी है। वे निर्दलीय पार्षद रह चुकी हैं और कांग्रेस से भी चुनाव लड़ चुकी हैं, लेकिन दोनों मौकों पर जीत नहीं मिली। चंदा सुहालका एक बार चुनाव जीत चुकी हैं और दो बार हार का सामना कर चुकी हैं, फिर भी टिकट की दौड़ में हैं। राजेश दया, महिमा चुघ, अमित श्रीवास्तव, ऋषभ जैन और देवेंद्र माली सहित कई अन्य नाम भी दावेदारी में हैं। संजय भगतानी पूर्व पार्षद हैं और पार्टी में वापसी के बाद फिर टिकट की कोशिश कर रहे हैं। वर्तमान पार्षद नेहा कुमावत भी दोबारा मैदान में उतरना चाहती हैं। पूर्व केन्द्रीय मंत्री गिरिजा व्यास की बहू हितांशी शर्मा ने भी दूसरी बार टिकट की दावेदारी की है।

अब पैनल में नाम नहीं, जीत का गणित होगा निर्णायक

दोनों दलों ने आवेदन और पैनल की प्रक्रिया लगभग पूरी कर ली है। अब असली परीक्षा टिकट तय करने की है। वरिष्ठता, संगठन में पद या पिछला चुनाव लड़ने का अनुभव ही पर्याप्त नहीं होगा। बदला हुआ वार्ड, आरक्षण, सामाजिक समीकरण, व्यक्तिगत पकड़, संगठन की सक्रियता और पिछला चुनावी प्रदर्शन सभी पहलुओं को साथ रखकर फैसला किया जा रहा। नामांकन के साथ अब तस्वीर जल्द साफ होगी कि पार्टियां अनुभव पर भरोसा करती हैं, नए चेहरों पर दांव लगाती हैं या परिवार के राजनीतिक प्रभाव को टिकट में जगह देती हैं।

Updated on:
28 Aug 2026 05:58 pm
Published on:
28 Aug 2026 05:58 pm