श्री गंगानगर

राजस्थान: 93 साल की मां को मिला न्याय, बहू-बेटे खाना नहीं देते थे, मारपीट करके घर से निकाला, SDM ने दिया बेदखली का आदेश

Rajasthan News: श्रीगंगानगर के सूरतगढ़ में 93 साल की वृद्धा लक्ष्मी देवी को भरण-पोषण अधिकरण से राहत मिली है। बेटे-बहू पर लगाए गए प्रताड़ना के आरोपों के बाद SDM ने बेटे को हर महीने 10 हजार रुपए देने और मकान से बेदखली के आदेश दिए हैं।
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93-year-old mother
वृद्धा की फोटो: पत्रिका

राजस्थान के श्रीगंगानगर जिले के सूरतगढ़ में वरिष्ठ नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा को लेकर उपखंड मजिस्ट्रेट और भरण-पोषण अधिकरण के पीठासीन अधिकारी भरत जयप्रकाश मीना ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अधिकरण ने 93 साल की वृद्धा को राहत देते हुए उसके बेटे को हर महीने 10 हजार रुपए भरण-पोषण राशि देने के आदेश दिए हैं। साथ ही पुलिस को निर्देश दिए गए हैं कि वृद्धा के मकान से बेटे और अन्य परिजनों को बेदखल कर तत्काल मकान का कब्जा वृद्धा को दिलाया जाए।

मामला सूरतगढ़ के वार्ड नंबर 34 निवासी 93 साल के विधवा लक्ष्मी देवी से जुड़ा है। वृद्धा ने अपने पुत्र ओमप्रकाश और परिवार के खिलाफ माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम-2007 के तहत भरण-पोषण अधिकरण में परिवाद पेश किया था।

बहू-बेटे ने मारपीट करके घर से निकाला

वृद्धा ने आरोप लगाया था कि उसका बेटा और बहू उसके साथ मारपीट करते हैं, उसे समय पर भोजन नहीं देते और घर से निकाल दिया गया। इसके चलते उसे काफी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा था और वृद्धावस्था में उसे कठिन परिस्थितियों में जीवन गुजारना पड़ रहा था।

SDM एवं भरण-पोषण अधिकरण के पीठासीन अधिकारी ने दिए आदेश

मामले की सुनवाई के बाद उपखंड मजिस्ट्रेट एवं भरण-पोषण अधिकरण के पीठासीन अधिकारी भरत जयप्रकाश मीना ने आदेश जारी किए। आदेश में पुत्र ओमप्रकाश को निर्देश दिए गए कि वह अपनी माता लक्ष्मी देवी के बैंक खाते में हर महीने 10 हजार रुपए भरण-पोषण राशि जमा करवाए। इसके साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि राशि जमा करने में देरी होने पर 18 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देना होगा।

अधिकरण ने सिटी पुलिस को भी निर्देश दिए कि वृद्धा के आवासीय मकान से अप्रार्थीगण को तत्काल बेदखल कर मकान का कब्जा लक्ष्मी देवी को सौंपा जाए। पुलिस को आदेश की पालना सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं। इस फैसले को वरिष्ठ नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। अपने फैसले में अधिकरण ने कहा कि भारतीय संविधान और वरिष्ठ नागरिक अधिनियम-2007 के तहत संतान का ये कानूनी और नैतिक दायित्व है कि वह अपने माता-पिता की देखभाल करे। वृद्धावस्था में माता-पिता को असहाय छोड़ना या उन्हें दर-दर भटकने के लिए मजबूर करना कानून और सामाजिक मूल्यों दोनों के खिलाफ है।

Updated on:
09 Jul 2026 09:58 am
Published on:
09 Jul 2026 09:37 am