
Laila-Majnu Tombs in Sri Ganganagar : सरहद पर बसे बिंजौर गांव में लैला-मजनूं की मजारों पर सोमवार को पांच दिवसीय मेले का समापन हो गया। हजारों श्रद्धालुओं की आस्था, लोक संस्कृति की रंगत और प्रेम की अमर दास्तान के बीच एक सवाल फिर गूंजता रहा कि क्या इन मजारों को कभी वह पहचान मिलेगी, जिसका सपना वर्षों से दिखाया जा रहा है? मार्च 2022 में तत्कालीन संभागीय आयुक्त ने घोषणा की थी कि लैला-मजनू मेले को पर्यटन विभाग की देखरेख में विकसित किया जाएगा तथा मजनूं सीमा चौकी और बिजौर क्षेत्र को पर्यटन मानचित्र पर विशेष स्थान दिलाने के प्रयास होंगे।
उस समय उम्मीद जगी थी कि सरहद पर स्थित यह अनूठा स्थल प्रदेश ही नहीं, देश के पर्यटन नक्शे पर उभरेगा, लेकिन चार साल बाद भी तस्वीर लगभग वैसी ही है। जिस प्रकार लोककथाओं में लैला-मजनूं का प्रेम अधूरा रह गया था, उसी प्रकार पर्यटन विकास के वादे भी अधूरे नजर आते है। मेला आज भी स्थानीय जनसहयोग, मेला कमेटी और अन्य व्यवस्थाओं के भरोसे ही आयोजित हो रहा है। राजस्थान के पर्यटन विभाग की सक्रिय भागीदारी अब भी दिखाई नहीं देती।
11 जून से शुरू हुए मेले का सोमवार को समापन हुआ। इस दौरान श्रद्धालुओं ने मजारों पर चादर चढ़ाकर मनोकामनाएं मांगी। अंतिम दिन कबड्डी प्रतियोगिताएं, अखाड़ा प्रदर्शन, लोकगीत और सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने मेले को जीवंत बनाए रखा। भीषण गर्मी के बावजूद राजस्थान, पंजाब, हरियाणा सहित विभिन्न राज्यों से हजारों लोग यहां पहुंचे। मेला स्थल की ओर जाने वाली लिंक रोड पर सुबह से देर दोपहर तक जाम की स्थिति बनी रही और लोग घंटों फंसे रहे।
इन मजारों को लैला-मजनूं की मजार मानने के ऐतिहासिक प्रमाण भले स्पष्ट नहीं हों, लेकिन लोगों की आस्था ने इन्हें प्रेम के प्रतीक के रूप में स्थापित कर दिया है। वर्षों से यहां आने वाले श्रद्धालु अपनी मनोकामनाएं पूरी होने की बातें बताते हैं और यही विश्वास इस मेले को जीवित रखे हुए है।
मेले का एक और वर्ष समाप्त हो गया, लेकिन चार साल पहले किए गए पर्यटन विकास के वादे आज भी अधूरे हैं। सरहद पर मोहब्बत का संदेश देने वाली ये मजारें अब भी ऐसे कदम की प्रतीक्षा कर रही हैं, जो इन्हें केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि राजस्थान की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान के रूप में स्थापित कर सके।