टोंक

Tonk: जनजातीय गौरव दिवस पर राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन, देशभर से आए प्रतिभागियों ने लिया हिस्सा

वनस्थली विद्यापीठ में जनजातीय गौरव दिवस पर राष्ट्रीय कार्यशाला आयोजित हुई। इसमें जनजातीय समाज की कला, संस्कृति, परंपराओं और प्रकृति से जुड़े ज्ञान पर चर्चा की गई।
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Updated: 3 Nov 2026, 12:32 PM IST
Banasthali Vidyapith
जनजातीय गौरव दिवस 2026 के मौके पर एक दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला (Photo-Patrika)

टोंक. वनस्थली विद्यापीठ के समाजशास्त्र विभाग की तरफ से जनजातीय गौरव दिवस 2026 के मौके पर एक दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला आयोजित की गई। इसमें जनजातीय समाज की परंपराओं, रहन-सहन और प्रकृति से जुड़े उनके पारंपरिक ज्ञान पर बात हुई। इसके अलावा कार्यशाला में देश की आजादी की लड़ाई में जनजातीय समुदायों के योगदान को भी याद किया गया। बता दें कि कार्यशाला में देश के अलग-अलग राज्यों से आए लोगों ने हिस्सा लिया। कार्यशाला में मुख्य वक्ता के तौर पर दिल्ली विश्वविद्यालय के समाज कार्य विभाग की प्रो. अर्चना कौशिक शामिल हुईं। वहीं, चीफ गेस्ट के रूप में एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. सृष्टि शास्त्री मौजूद रहीं।

जनजातीय समाज की परंपराओं और चुनौतियों पर हुई चर्चा

कार्यशाला में जनजातीय समाज के इतिहास, उनकी संस्कृति, परंपराओं और आज उनके सामने आने वाली चुनौतियों पर भी चर्चा हुई। सामाजिक विज्ञान संकाय के डीन और समाजशास्त्र विभाग के अध्यक्ष प्रो. हितेंद्र सिंह राठौर ने जनजातीय गौरव दिवस मनाने के महत्व के बारे में भी बताया। मुख्य अतिथि डॉ. सृष्टि शास्त्री ने भारतीय जनजातीय कला की अलग-अलग शैलियों के बारे में जानकारी दी।

जंगल को बताया प्रकृति का पूरा तंत्र

कार्यशाला में बातचीत के साथ कुछ दिलचस्प गतिविधियां भी कराई गईं। 'वर्ड क्लाउड' गतिविधि में प्रतिभागियों ने जनजातीय समाज से जुड़े शब्द लिखे और अपने विचार रखे। प्रो. अर्चना कौशिक ने बताया कि जंगल सिर्फ पेड़ों का समूह नहीं, बल्कि एक पूरा पारिस्थितिकी तंत्र है। जनजातीय समुदायों का जीवन जल, जंगल और जमीन से जुड़ा हुआ है। उन्हें प्रकृति और प्राकृतिक संसाधनों की अच्छी समझ होती है। उनके पास पर्यावरण से जुड़ा ऐसा पारंपरिक ज्ञान है, जिसे समझने के साथ-साथ सहेजना भी जरूरी है।

औषधीय पौधों और जनजातीय चित्रकला से कराया परिचित

कार्यशाला में 'एथ्नोमेडिसिन ट्रेजर हंट' नाम से एक गतिविधि भी रखी गई। इसके जरिए प्रतिभागियों को जनजातीय समुदायों की पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों और औषधीय पौधों के बारे में बताया गया। इसके अलावा 'सेलिब्रेटिंग ट्राइबल आर्ट' गतिविधि में गोंड, भील और वारली चित्रकला की झलक देखने को मिली।

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3 Nov 2026, 12:32 PM IST
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