
टोडारायसिंह। कभी मिट्टी की मटकियों से बने रावण, कुंभकरण और मेघनाद के पुतलों पर शहरवासी श्रीराम की सेना बनकर टूट पड़ते थे। मटकी के टुकड़े लूटने की होड़ के बीच लंका विजय का प्रतीकात्मक उत्सव मनाया जाता था। आज उसी दशहरे की पहचान 51 फीट ऊंचे रावण के पुतले, आतिशबाजी और भव्य शोभायात्रा बन चुके हैं। करीब सात दशक में टोडारायसिंह के दशहरा महोत्सव ने परंपरा से आधुनिकता तक का सफर तय किया है, लेकिन बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश आज भी कायम है।
स्थानीय वयोवृद्ध दिनेश तिवारी और पुष्पचंद जैन बताते हैं कि आजादी के बाद से नगरपालिका मंडल की ओर से विजयादशमी का आयोजन होता रहा है। हालांकि, 1970 के दशक से पहले यहां रावण दहन की परंपरा नहीं थी। उस समय मिट्टी की मटकियों से रावण, कुंभकरण और मेघनाद के पुतले बनाए जाते थे। ब्राह्मण समाज का एक व्यक्ति हनुमान की भूमिका निभाता था। वह तक्षकगिरी पहाड़ी स्थित गढ़ के बालाजी से सिंदूर लगाकर हनुमानजी का प्रतीकात्मक रूप धारण कर आता था।
कल्याणजी के चौक स्थित श्रीराम मंदिर से शोभायात्रा रवाना होकर हाडीरानी कुंड पहुंचती थी। वहां शहरवासी श्रीराम की सेना के रूप में मटकी के पुतलों पर हमला करते और उनके टुकड़े लूटते थे। इसे लंका विजय का प्रतीक माना जाता था। इस आयोजन में धार्मिक आस्था के साथ लोक परंपरा और सामूहिक सहभागिता की झलक दिखाई देती थी।
पेंटर हरिराम गौड़ के अनुसार, 1970 के दशक में तत्कालीन नगरपालिका अधिशासी अधिकारी फखरुद्दीन ने दशहरा आयोजन का स्वरूप बदलने की पहल की। कोटा और जयपुर की तर्ज पर रावण का पुतला बनाकर शोभायात्रा के साथ दहन करने की परंपरा शुरू हुई। शुरुआत में स्थानीय पेंटर बंशीलाल गौड़ को पुतला बनाने की जिम्मेदारी सौंपी गई। उस समय करीब 15 से 20 फीट ऊंचा रावण बनाया गया। धीरे-धीरे पुतले की ऊंचाई बढ़ती गई और अब यह 51 फीट तक पहुंच गई है। बाद में कुंभकरण और मेघनाद के पुतले भी बनाए जाने लगे।
दशहरा महोत्सव के बदलते स्वरूप के साथ पुतले बनाने की कला भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ी। बंशीलाल गौड़ के बाद उनके बेटे हरिराम गौड़ ने जिम्मेदारी संभाली। अब तीसरी पीढ़ी में हरिराम के बेटे विष्णु गौड़ और तरुण गौड़ भी इस काम में जुटे हैं। पुतलों की आकृति तैयार करने से लेकर उन्हें आकर्षक स्वरूप देने तक कई दिनों की मेहनत लगती है। अब तकनीक और आतिशबाजी के प्रयोग से रावण की आंखों से अंगारे, नाभि से अग्निचक्र और मुंह से चीत्कार की आवाज निकालने जैसी व्यवस्थाएं की जाती हैं।
समय के साथ आयोजन स्थल भी बदल गया। कभी हाडीरानी कुंड में होने वाला दशहरा अब बीसलपुर मार्ग स्थित दशहरा मैदान में मनाया जाता है। कटला प्रांगण से निकलने वाला जुलूस, देवी-देवताओं की झांकियां और राम-रावण संवाद आयोजन को खास बनाते हैं। मटकी के पुतलों से शुरू हुई यह परंपरा आज विशाल पुतलों के दहन तक पहुंच गई है। आयोजन का स्वरूप भले ही बदल गया हो, लेकिन दशहरे की मूल भावना आज भी वही है- अधर्म पर धर्म और बुराई पर अच्छाई की विजय।