
राजस्थान में दशहरा मनाने की अलग-अलग परंपराएं। फोटो: पत्रिका
जयपुर। राजस्थान में दशहरा सिर्फ रावण दहन का पर्व नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही अनूठी परंपराओं और लोक आस्थाओं का उत्सव भी है। कहीं रावण के पुतले को पैरों तले रौंदकर अहंकार का अंत किया जाता है तो कहीं दहन से पहले उसी पुतले की पूजा होती है। झालरापाटन में रावण, मंदोदरी, कुंभकर्ण, विभीषण और मेघनाद का कुनबा करीब 186 साल से स्थायी मूर्तियों के रूप में खड़ा है।
कोटा में जेठी समाज के अखाड़ों में मिट्टी के रावण का प्रतीकात्मक वध होता है, जिसके बाद पारंपरिक कुश्ती भी होती है। भीलवाड़ा में राम-रावण युद्ध के मंचन के बाद अग्निबाण से पुतलों का दहन आकर्षण का केंद्र रहता है। चूरू में रेलवे कर्मचारियों की पहल से शुरू हुई रावण दहन की परंपरा छह दशक से अधिक समय से जारी है। सिरोही में रावण दहन के बाद जलेबी-फाफड़े की मिठास उत्सव को खास बनाती है। इन विविध रंगों में राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत और लोक आस्था की झलक दिखाई देती है।
झालरापाटन में दशहरे की पहचान रावण दहन से ज्यादा रावण के पूरे कुनबे की स्थायी मूर्तियों से है। यहां दशहरा मैदान में रावण के साथ मंदोदरी, कुंभकर्ण, विभीषण, मेघनाद और मारीच की मूर्तियां भी मौजूद हैं। बताया जाता है कि इनका निर्माण करीब 1840 में कराया गया था। बाद में 1920 में इन्हें पक्का स्वरूप दिया गया। इस तरह रावण का यह कुनबा करीब 186 साल से यहां खड़ा है। दूसरी जगहों पर जहां हर साल रावण का पुतला तैयार कर जलाया जाता है, वहीं झालरापाटन में ये स्थायी मूर्तियां दशहरे की ऐतिहासिक विरासत को संजोए हुए हैं। यहां मंदोदरी के वस्त्रों को लेकर भी एक मान्यता प्रचलित है। लोग उसके वस्त्रों के टुकड़े घर ले जाते हैं और इसे सुख-समृद्धि से जोड़कर देखते हैं। दशहरे के दौरान इन मूर्तियों को देखने के लिए लोग पहुंचते हैं। रावण के परिवार की स्थायी मौजूदगी इस आयोजन को राजस्थान की दूसरी दशहरा परंपराओं से अलग पहचान देती है।
कोटा के किशोरपुरा और नांता में जेठी समाज के अखाड़ों में दशहरे पर रावण के वध की परंपरा बाकी जगहों से अलग है। यहां मिट्टी से रावण की आकृति बनाई जाती है। दशमी की सुबह पूजा-अर्चना के बाद बच्चे इस आकृति को पैरों तले रौंदते हैं। इसे रावण के प्रतीकात्मक वध और अहंकार के अंत के रूप में देखा जाता है। इस परंपरा के साथ अखाड़ों की पुरानी खेल-संस्कृति भी जुड़ी हुई है। रावण को रौंदने की रस्म पूरी होने के बाद पारंपरिक कुश्ती का आयोजन किया जाता है। इसमें पहलवान अपने दांव-पेच दिखाते हैं और स्थानीय लोग उत्साह से मुकाबले देखते हैं। पूजा के बाद श्रद्धालुओं को ज्वारे भी बांटे जाते हैं। इस तरह यहां दशहरा केवल पुतला जलाने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि धार्मिक अनुष्ठान, बच्चों की भागीदारी और कुश्ती की परंपरा को एक साथ जोड़ता है। किशोरपुरा और नांता के अखाड़ों में निभाई जाने वाली यह रस्म कोटा के दशहरा उत्सव की विशिष्ट पहचान है।
भीलवाड़ा के तेजाजी चौक में दशहरा उत्सव करीब पांच दशक से आयोजित हो रहा है। यहां रावण दहन से पहले रामलीला के दौरान राम और रावण के युद्ध का मंचन किया जाता है। युद्ध के दृश्य के बाद भगवान राम का पात्र अग्निबाण चलाता है। इसके बाद आधुनिक तकनीक और रिमोट कंट्रोल की मदद से पुतलों में आग लगाई जाती है। इस तरह पारंपरिक रामलीला और आधुनिक तकनीक का मेल आयोजन को खास बनाता है। दशहरे पर शोभायात्रा भी निकाली जाती है, जो आजाद चौक से शुरू होकर आयोजन स्थल तक पहुंचती है। रावण के साथ मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतले भी तैयार किए जाते हैं। इनके दहन के दौरान आतिशबाजी आकर्षण का केंद्र रहती है। इस आयोजन को देखने के लिए करीब 8 से 10 हजार लोगों के जुटने की जानकारी है। भीलवाडा में राम-रावण युद्ध का जीवंत मंचन, अग्निबाण और तकनीक से होने वाला दहन दशहरे को एक बड़े सार्वजनिक आयोजन का रूप देता है।
सिरोही में दशहरे का उत्सव रावण दहन के साथ मिठास भी घोलता है। यहां रावण दहन के बाद जलेबी खरीदकर घर ले जाने की परंपरा है। पर्व के दिन मिठाई की दुकानों पर लोगों की आवाजाही बढ़ जाती है। पिछले 15-20 वर्षों में गुजरात से सटे होने के कारण जलेबी के साथ फाफड़ा खाने का चलन भी बढ़ा है। दशहरे के दिन जलेबी-फाफड़े की दुकानों और नाश्ते के ठेलों पर भीड़ नजर आती है। परिवार के लोग दहन देखने के बाद मिठाई और नाश्ता खरीदते हैं। इस तरह रावण दहन के साथ खानपान भी उत्सव का हिस्सा बन गया है। सिरोही की यह परंपरा बताती है कि त्योहारों की पहचान केवल धार्मिक आयोजन से नहीं बनती, बल्कि उनसे जुड़ी स्थानीय खानपान की आदतें भी उन्हें खास बनाती हैं। गुजरात की निकटता का असर यहां के स्वाद पर भी दिखाई देता है। बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश देने वाला दशहरा सिरोही में जलेबी-फाफड़े की मिठास के साथ यादगार बनता है।
सिरोही जिले के मंडार और आसपास के गांवों में दशहरे पर शस्त्र पूजन की परंपरा निभाई जाती है। राजपूत परिवारों में इस दिन पूर्वजों के शस्त्रों को बाहर निकालकर उनकी साफ-सफाई की जाती है। इसके बाद शस्त्रों को मां चामुंडा के समक्ष रखकर पूजा-अर्चना की जाती है। शस्त्रों पर मौली बांधी जाती है और कुमकुम, अबीर-गुलाल तथा पुष्पों से पूजन किया जाता है। परिवार के मुखिया आरती करते हैं। इस रस्म में पुराने शस्त्र केवल हथियार नहीं, बल्कि परिवार की विरासत और पूर्वजों की स्मृतियों के प्रतीक भी होते हैं। दशहरे पर शस्त्र पूजन को शक्ति, परंपरा और पूर्वजों के प्रति सम्मान से जोड़कर देखा जाता है।
दशहरा आयोजन की परंपरा 74 साल से चली आ रही है और इस बार इसका 75वां आयोजन है। यहां की खासियत राम और रावण की सचेतन झांकियां हैं। दोनों पात्र घोड़े और बग्घियों पर सवार होकर शहर के प्रमुख मार्गों से गुजरते हैं। बैंड-बाजों के साथ निकलने वाली इस शोभायात्रा को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग जुटते हैं। इसके बाद रामलीला मैदान में रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतलों का दहन किय जाता है। आयोजन में झांकियों और शोभायात्रा का विशेष महत्व है, जो इसे केवल मैदान में होने वाले रावण दहन से अलग बनाता है। इस परंपरा में शहर के प्रमुख रास्ते भी उत्सव का हिस्सा बन जाते हैं।
सुदरासन में रावण दहन की परंपरा करीब 30 साल पुरानी है। शुरुआत में पुतला बनाने के लिए बांस की खपच्चियों, पुराने कपड़ों, अखबार और कड़बी का इस्तेमाल किया जाता था। पुतले पर कागज चिपकाने के लिए आटे की लोई काम में ली जाती थी। समय के साथ निर्माण के तरीके में बदलाव आया है। अब पुतले के ढांचे में लोहे का इस्तेमाल होने लगा है। कागज चिपकाने के लिए आटे की लोई के बजाय फेविकोल उपयोग में लिया जाता है, जबकि चेहरे के लिए बाजार में मिलने वाले तैयार मुखौटे भी इस्तेमाल किए जाते हैं।
अनूपगढ़ में दशहरे के लिए रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले तैयार करने वाले कारीगर दहन से पहले उनकी पूजा-अर्चना करते हैं। पुतलों को खड़ा करने से पहले विधि-विधान से पूजा कर प्रसाद चढ़ाया जाता है। यह परंपरा इसलिए खास है, क्योंकि जिन पुतलों को बाद में बुराई के प्रतीक के रूप में जलाया जाता है, उनके निर्माण से जुड़े लोग पहले उनका सम्मान करते हैं। स्थानीय मान्यता के अनुसार रावण प्रकांड विद्वान था और उसका जन्म ब्राह्मण कुल में हुआ था। इसी धारणा के चलते कारीगर पुतले के प्रति श्रद्धा का भाव रखते हैं। उनका विश्वास है कि पूजा-अर्चना करने से पुतले बनाने और खड़ा करने का काम बिना किसी बाधा के पूरा होता है। रावण दहन के आयोजन में कारीगरों की मेहनत महत्वपूर्ण होती है और यह पूजा उनके काम का हिस्सा बन चुकी है। अनूपगढ़ की यह परंपरा दशहरे के उस पहलू को सामने लाती है, जिसमें बुराई के प्रतीक के दहन के साथ रावण के विद्वान होने की मान्यता भी मौजूद है।
चूरू की रेलवे कॉलोनी में रावण दहन की परंपरा वर्ष 1968 में शुरू हुई थी। तब यहां 30 फीट ऊंचे रावण के पुतले का दहन किया गया था। समय के साथ आयोजन का दायरा बढ़ता गया और अब पुतले की ऊंचाई 60 फीट से अधिक हो गई है। इस आयोजन की शुरुआत रेलवे कर्मचारियों की पहल पर हुई थी। धीरे-धीरे यह कॉलोनी तक सीमित रहने के बजाय शहर के सामूहिक उत्सव का रूप लेता गया। आज भी आयोजन जनसहयोग से किया जाता है। इसकी व्यवस्थाओं में अलग-अलग समुदायों के लोग बढ़ती ऊंचाई के साथ आयोजन की भागीदारी निभाते हैं। छह दशक से चली आ रही यह परंपरा बताती है कि किसी छोटे सामुदायिक प्रयास को लोगों की सहभागिता किस तरह बड़े आयोजन में बदल सकती है। पुतले की पहचान भी मजबूत हुई है।
Updated on:
20 Oct 2026 09:30 am
Published on:
20 Oct 2026 09:30 am
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