क्या पुराने टायरों का ढेर भीषण गर्मी का 'इलाज' बन सकता है? सुनने में थोड़ा अजीब लग सकता है। लेकिन उदयपुर के वैज्ञानिकों ने कबाड़ के इसी ढेर में भविष्य के घरों की 'कूलिंग' ढूंढ़ निकाली है।
उदयपुर: भीषण गर्मी में भारत जैसे देशों में घरों को ठंडा रखना एक बड़ी चुनौती है। इस दिशा में रिसाइकल्ड रबर का उपयोग कर एक एनवायरनमेंट फ्रेंडली तकनीक से घरों को ठंडा रखने की तकनीक सामने आई है।
इंडियन रबर इंस्टीट्यूट की राजस्थान शाखा के अध्यक्ष डॉ. सुनील कुमार जगासिया ने खराब टायरों से प्राप्त रिसाइकल्ड रबर का उपयोग कर एक पर्यावरण-अनुकूल समाधान विकसित किया है। रबर एक अच्छा ऊष्मा रोधक (इंसुलेटर) होने के कारण गर्मी को अवशोषित नहीं करता, जिससे अंदर का वातावरण ठंडा रहता है।
इससे घर के अंदर का तापमान तीन से चार डिग्री सेल्सियस तक कम रहता है। इस शोध में उदयपुर के राहुल माथुर और मुंबई के दिनेश पोरवाल का भी सहयोग रहा।
यह शोध इंटरनेशनल जर्नल आफ क्रिएटिव रिसर्च थॉट्स (आईजेसीआरटी) में भी प्रकाशित हुआ है। इंडियन रबर इंस्टीट्यूट की देश में आठ शाखाएं हैं। राजस्थान में इकलौता चैप्टर उदयपुर में है। उदयपुर के सेक्टर चार में एक आवासीय मल्टीस्टोरी आर्ची पीस पार्क के परिसर में तैयार किया गया है। इसमें रेत और सीमेंट के साथ रबर का मिक्सचर है।
इस शोध में अपशिष्ट/उपयोग किए गए टायरों से प्राप्त रबर यानी "क्रम्ब रबर" का उपयोग भवन निर्माण सामग्री में किया गया। प्रयोग में दीवारों की प्लास्टर के लिए उपयोग होने वाली सीमेंट, रेत और पानी का मिश्रण में रेत के स्थान पर 10 फीसदी तक रिसाइकल्ड रबर का उपयोग किया।
-डॉ. सुनील कुमार जगासिया, अध्यक्ष, इंडियन रबर इंस्टीट्यूट राजस्थान शाखा
रेत की बचतः भविष्य में रेत की उपलब्धता गंभीर समस्या बन सकती है, यह तकनीक प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में सहायक।
टायर अपशिष्ट का समाधानः नॉन-बायोडिग्रेडेबल टायर कचरा एक बड़ी पर्यावरणीय समस्या है। इस तकनीक से इस उपयोग का प्रभावी मार्ग।
प्लास्टर की मजबूती में सुधारः रबर के उपयोग से प्लास्टर में लचीलापन बढ़ता है, जिससे नमी या हल्के भूकंपीय प्रभाव कारण होने वाली दरारों में कमी।