स्किन कैंसर जागरूकता माह के तहत उदयपुर के विशेषज्ञों ने मेवाड़ में तेज धूप और हाई यूवी इंडेक्स को बड़ा खतरा बताया। डॉक्टरों ने SPF 30 सनस्क्रीन, फुल कपड़े, टोपी और नियमित जांच अपनाने की सलाह दी। समय रहते पहचान और बचाव से स्किन कैंसर का खतरा काफी हद तक टाला जा सकता है।
उदयपुर: तेज धूप, उच्च यूवी इंडेक्स और बदलती जीवनशैली से हमारी त्वचा पर असर डाल रही है। मेवाड़ की भौगोलिक स्थिति, खासकर अरावली क्षेत्र में सूर्य किरणों के परावर्तन से जोखिम बढ़ रहा है। ऐसे में समय पर जागरूकता और जांच बेहद जरूरी है।
बता दें कि मई की महीना स्किन कैंसर जागरूकता माह है। स्किन कैंसर का मुख्य कारण सूर्य से आने वाली अल्ट्रावायलेट किरणें हैं। ये त्वचा की गहराई में जाकर डीएनए को नुकसान पहुंचाती हैं और समय से पहले बुढ़ापा लाती हैं। यूवीबी किरणें सनबर्न और कैंसर का कारण बनती हैं। कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली, गोरी स्किन और रसायन जोखिम बढ़ाते हैं।
स्किन कैंसर तीन प्रकार का होता है। बेसल सेल कार्सिनोमा सबसे सामान्य है, जो स्किन की निचली परत से शुरू होकर धीरे-धीरे बढ़ता है। इसके लक्षणों में चमकदार उभार या लंबे समय तक न भरने वाला घाव शामिल है।
दूसरा स्क्वैमस सेल कार्सिनोमा है, जो स्किन की ऊपरी परत को प्रभावित करता है, ज्यादा आक्रामक है। यह अन्य हिस्सों में भी फैल सकता है। सबसे खतरनाक प्रकार मेलानोमा है, जो तेजी से फैलता है। इसके लिए एबीसीडीई नियम असमान आकार, अनियमित किनारे, रंग में बदलाव, 6 मिमी से बड़ा आकार और समय के साथ परिवर्तन महत्वपूर्ण संकेत माने जाते हैं।
रेडिएशन ऑन्कोलॉजी विभाग के प्रोफेसर डॉ. नरेंद्र राठौड़ के अनुसार, स्किन कैंसर को शुरुआती अवस्था में आसानी से पहचाना जा सकता है। डर्मेटोस्कोपी, स्किन बायोप्सी और पीईटी सिटी जांचें की जाती हैं। समय रहते पहचान हो जाए तो इसका उपचार पूरी तरह संभव है।
त्वचा पर मौजूद किसी संदिग्ध तिल या मस्से की पहचान के लिए एबीसीडीई नियम जरूरी है।
मेवाड़ की परंपरा में में साफा और पगड़ी केवल सांस्कृतिक पहचान नहीं, बल्कि धूप से बचाव का प्रभावी माध्यम भी हैं, लेकिन बदलते समय के साथ इन्हीं परंपराओं को आधुनिक सुरक्षा उपायों जैसे सनस्क्रीन और नियमित जांच के साथ जोड़ना जरूरी हो गया है, क्योंकि स्किन कैंसर एक ऐसा रोग है जिसे शुरुआती अवस्था में हम खुद भी पहचान सकते हैं बस जरूरत है जागरूकता और समय पर सही कदम उठाने की।
-डॉ. नरेंद्र राठौड़, प्रोफेसर, रेडिएशन ऑन्कोलॉजी विभाग