Holi 2026: फाग की बयार के साथ राजस्थान लोक-परंपराओं के अनूठे रंगों में सराबोर है। प्रदेश में होली केवल अबीर-गुलाल नहीं, बल्कि पराक्रम, आस्था और सामाजिक संदेशों का उत्सव है। मेनार में बंदूक-तलवारों के साथ ‘बारूद की होली’ और गेर नृत्य आकर्षण का केंद्र हैं।
Rajasthan Holi 2026: फाग की बयार बहते ही राजस्थान की माटी लोक-परंपराओं के अनूठे रंगों में सराबोर हो गई है। राजस्थान में होली केवल रंगों का खेल नहीं। बल्कि पराक्रम, प्रायश्चित और अटूट विश्वास का संगम है।
यहां केवल गुलाल नहीं उड़ती, सदियों पुरानी उन परंपराओं को भी जीवित कर देती है जो हमारी पहचान है। कहीं ग्रामीण गांव छोड़कर पूर्व दिशा की ओर दौड़ रहे हैं, तो कहीं जलती होली को उखाड़ने का हैरतअंगेज प्रदर्शन होता है। आइए रूबरू होते हैं, इन अजब-गजब और जीवंत होती होली की परंपराओं से।
राजस्थान में होली केवल अबीर-गुलाल और मौज-मस्ती तक ही सीमित नहीं है। बल्कि यह प्रदेश की सतरंगी लोक-संस्कृति, ऐतिहासिक मान्यताओं और अनूठी परंपराओं का जीवंत उदाहरण है। अलग-अलग अंचलों में सदियों से अद्भुत और रोचक परंपराएं निभाई जा रही हैं, जो होली के इस पर्व को बेहद खास बनाती हैं।
कहीं नवजातों की ढूंढ रस्म में अब बेटियों को भी बराबरी का दर्जा मिल रहा है, तो कहीं कुंआरों की शादी की कामना के साथ अनोखी बारात निकाली जाती है। कहीं कुरीतियों पर करारा व्यंग्य करते हुए स्वांग रचे जाते हैं, तो कहीं बारूद से होली खेली जाती है।
किसी गांव में लोक आस्था के चलते लोग होली पर अपना गांव छोड़ देते हैं, तो कहीं भगवान खुद अपनी ससुराल में होली खेलने जाते हैं। मेवाड़ की परंपरागत होली से लेकर ब्रज के लट्ठमार रंग तक, और हाड़ौती के हिरण्यकश्यप दहन से लेकर मारवाड़-सिंध की 'हाट' परंपरा तक हर इलाके की अलग और अनूठी छटा है। आइए, एक नजर डालते हैं अजब-गजब होली परंपराओं पर, जो आधुनिकता के इस दौर में भी सांस्कृतिक जड़ों की गहराई से जुड़ी हुई हैं।
मेवाड़ में होली का पर्व मंदिरों में बसंत पंचमी से रंग पंचमी तक मनाया जाता है। होली पर वडुलियां अर्पित करने की परंपरा है। इसमें गाय के गोबर से जेवर बनाकर होली को अर्पित किए जाते हैं। अलग-अलग देवरों पर गेर नृत्य किया जाता है। मेनार गांव में बारूद की होली खेली जाती है। इसमें नृत्य करने वालों के हाथों में बंदूक और तलवार होती है।