
Rajasthan : कभी अलमारी में रखा फोटो एलबम परिवार की सबसे कीमती धरोहर था। शादी, बचपन, त्योहार और यात्राओं की यादें इन्हीं में सुरक्षित रहती थीं। जब भी मन होता था तब अपने परिवार के सदस्यों के साथ लोग एलबम की एक-एक फोटो को बेहद चाव के साथ देखते थे। हर फोटो के साथ परिवार की हर सदस्य की यादें जुड़ी होती थी। फोटो तो एक होती थी पर कहानियां सब की अलग-अलग होती थी। अब मोबाइल कैमरे और क्लाउड स्टोरेज के दौर में तस्वीरें तो हजारों की संख्या में है, पर उन्हें एलबम में सहेजने की परंपरा खत्म हो रही है। ज्यादातर परिवारों की यादें मोबाइल, गूगल फोटो, आईक्लाउड और हार्ड डिस्क तक सीमित है। तकनीक ने तस्वीरें संभालना आसान बनाया है, पर बदलते डिवाइस, पासवर्ड और डिजिटल निर्भरता से इनके खोने का खतरा भी बढ़ गया। 15 से 21 वर्ष आयु वर्ग के कई जैन जी के लिए पारंपरिक फोटो एलबम अब अनजान चीज बन चुका है। पारिवारिक आयोजनों की तस्वीरें व्हाट्सएप ग्रुप और सोशल मीडिया पर साझा होकर वहीं दब जाती है।
फिल्म कैमरे के समय एक रोल में 24 या 36 तस्वीरें ही आती थीं। इसलिए हर फोटो सोच समझकर ली जाती थी। सीमित संख्या के कारण हर तस्वीर खास होती थी। स्मार्टफोन ने तस्वीरों की दुनिया बदल दी। अब लोग एक दिन में सैकड़ों फोटो खींच लेते है। दुनिया में हर साल 1.8 ट्रिलियन से अधिक तस्वीरें खींची जाती है और इनमें 92 प्रतिशत तस्वीरें स्मार्टफोन से ली जाती है।
उदयपुर के वरिष्ठ फोटोग्राफर लोकेश चौबीसा के अनुसार पहले शादी या पारिवारिक कार्यक्रम के बाद बड़े फोटो एलबम बनवाना सामान्य था। अब प्रिंटिंग का काम मुख्य रूप से वेडिंग एल्बम, फोटो फ्रेम और विशेष अवसरों तक सीमित रह गया है।
मोबाइल बदलने के दौरान डेटा ट्रांसफर की समस्या।
क्लाउड अकाउंट बंद होने या पासवर्ड भूलने का खतरा।
स्टोरेज भरने पर फोटो डिलीट करना।
नई पीढ़ी का प्रिंट फोटो से दूर होना।
तथ्य - स्थिति
1- संभावित रोज फोटो क्लिक करने वाले यूजर - करीब 2.5-3 करोड़ यूजर।
2- एक सक्रिय यूजर द्वारा रोज औसत फोटो - 3-5 फोटो।
3- रोज क्लिक होने वाली तस्वीरें - 7.5 करोड़ से 15 करोड़ रोज।
4- सालभर में अनुमानित तस्वीरें - 2,700 करोड़ से 5,400 करोड़।