
Udaipur Municipal Elections Reservation Lottery: उदयपुर: नगर निकाय चुनाव से पहले गुरुवार को जयपुर में निकली आरक्षण लॉटरी ने उदयपुर जिले की सियासत में बड़ा भूचाल ला दिया। सबसे ज्यादा असर उदयपुर नगर निगम के महापौर पद पर पड़ा। जहां इस बार सीट अनारक्षित निकली है। यानी अब किसी भी वर्ग का प्रत्याशी महापौर पद के लिए चुनाव लड़ सकेगा। इसी तरह भींडर नगर पालिका और सलूंबर नगर परिषद के चेयरमैन पद भी अनारक्षित रखे गए हैं।
आरक्षण की तस्वीर साफ होते ही दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों भाजपा और कांग्रेस में दावेदारों का घमासान शुरू हो गया है, जिन नेताओं को आरक्षण के कारण अब तक अपनी दावेदारी को लेकर संशय था, उनके लिए मैदान खुल गया है। कई पुराने दिग्गजों के साथ नए चेहरे भी सक्रिय हो गए हैं।
राजनीतिक गलियारों में बैठकों, संपर्कों और संभावित समीकरणों को लेकर चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। हालांकि, महापौर की कुर्सी तक पहुंचने के लिए पहले पार्षद बनना होगा। कौन सा नेता किस वार्ड से चुनाव लड़ेगा, इसका फैसला वार्डों के आरक्षण की लॉटरी के बाद होगा। फिलहाल, दावेदारों की नजर अब वार्ड आरक्षण की गोटी पर टिक गई है।
दोनों पार्टियों में सक्रिय पदाधिकारियों ने कहा कि संगठन का निर्णय सर्वोपरि होगा। पार्टी टिकट का फैसला वार्ड आरक्षण, संबंधित नेता की चुनावी स्थिति, संगठन में पकड़, जातीय एवं क्षेत्रीय समीकरण और जीत की संभावनाओं को देखकर किया जाएगा।
अनारक्षित सीट होने से दोनों दलों के सामने एक नई चुनौती भी खड़ी हो गई है। जब सीट किसी एक वर्ग के लिए आरक्षित नहीं है तो दावेदारों की संख्या बढ़ना तय है, लेकिन टिकट केवल एक को मिलना है। ऐसे में टिकट वितरण के दौरान दोनों दलों के भीतर भी सियासी खींचतान और घमासान देखने को मिल सकता है।
जिले के अन्य नगर निकायों में भी आरक्षण की तस्वीर बदल गई है। उदयपुर नगर निगम, भींडर नगर पालिका और सलूंबर नगर परिषद के शीर्ष पद अनारक्षित होने से यहां किसी भी वर्ग का प्रत्याशी दावेदारी कर सकेगा। फतहनगर सनवाड़ नगर पालिका का चेयरमैन पद अनारक्षित महिला के लिए रहेगा। कानोड़ नगर पालिका में ओबीसी ओपन, मावली नगर पालिका में एसटी ओपन और वल्लभनगर नगर पालिका में एसटी महिला आरक्षित किया है।
जिले के छह निकायों में कुल 190 वार्ड और 516 मतदान केंद्र हैं। इनमें उदयपुर नगर निगम के 80 वार्डों के लिए 406 मतदान केंद्र, मावली के 20 वार्डों के लिए 20, वल्लभनगर के 20 वार्डों के लिए 20, भींडर के 25 वार्डों के लिए 25, फतहनगर सनवाड़ के 25 वार्डों के लिए 25 और कानोड़ के 20 वार्डों के लिए 20 मतदान केंद्र हैं। उदयपुर में 415672 मतदाता, मावली में 8118, वल्लभनगर में 8277, भींडर में 13739, फतहनगर-सनवाड़ में 17473 और कानोड़ में 9330 मतदाता हैं।
राजनीतिक दलों और संभावित प्रत्याशियों की नजर नगर निगम, जिला परिषद और पंचायत समिति वार्डों के आरक्षण की लॉटरी पर है। जिला प्रमुख सामान्य महिला से अनारक्षित जिला प्रमुख पद की अनारक्षित सीट ने उदयपुर की ग्रामीण सियासत बदल दी है। गुरुवार को आरक्षण की तस्वीर साफ होते ही भाजपा और कांग्रेस के संभावित दावेदारों की सक्रियता बढ़ गई।
पिछले चुनाव में जिला प्रमुख पद सामान्य महिला आरक्षित था, इस बार अनारक्षित हो गया। यानी अब किसी भी वर्ग का प्रत्याशी जिला प्रमुख बनने की दौड़ में शामिल हो सकता है। सलूंबर जिला बनने और उदयपुर शहर से सटी पेराफेरी पंचायतों के अलग होने के बाद जिला परिषद का पूरा चुनावी गणित बदल चुका है।
पुराने राजनीतिक प्रभाव क्षेत्र अब पहले जैसे नहीं रहे। ऐसे में जिला प्रमुख की कुर्सी तक पहुंचने की लड़ाई नए सिरे से होगी। जिले की 20 पंचायत समितियों में 590 ग्राम पंचायतें, 318 पंचायत समिति वार्ड और 4948 मतदान केंद्र हैं। इन पंचायत समितियों में 1378261 मतदाता हैं।
इनमें 7 लाख पुरुष, 674307 महिलाएं और 4 ट्रांसजेंडर हैं। ऐसे में जिला परिषद से लेकर पंचायत समिति और ग्राम पंचायत तक इस बार का चुनाव बड़ा राजनीतिक प्रभाव रखने वाला है। जिला प्रमुख पद ओपन होने से भाजपा-कांग्रेस को मजबूत चेहरों की तलाश करनी होगी।
इस बार उदयपुर नगर निगम चुनाव पहले के मुकाबले और ज्यादा चुनौतीपूर्ण होने वाला है। नगर निगम में 10 नए वार्ड जुड़ने के बाद पूरे शहर का परिसीमन बदल चुका है। कई कॉलोनियां और गलियां एक से दूसरे वार्ड में चली गई हैं।
वार्ड नंबर बदले हैं तो कई जगह वार्डों का क्षेत्र भी बदल गया है। इस बदलाव ने संभावित प्रत्याशियों की मुश्किल बढ़ा दी है, जिन नेताओं की किसी खास वार्ड में वर्षों से राजनीतिक पकड़ थी, उन्हें भी अब नए क्षेत्र और नए मतदाताओं के बीच अपनी जमीन मजबूत करनी होगी। ऐसे में महापौर पद के दावेदारों के लिए सिर्फ पार्टी का टिकट हासिल करना ही चुनौती नहीं होगा, बल्कि पहले अपने लिए सुरक्षित और जीतने योग्य वार्ड तलाशना भी बड़ी परीक्षा होगी।
उदयपुर नगर निगम के इतिहास में भाजपा का दबदबा रहा है। शहर में अब तक भाजपा के छह बोर्ड बन चुके हैं। इनमें किरण माहेश्वरी वर्ष 1994, युधिष्ठिर कुमावत 1999, रवीन्द्र श्रीमाली 2004, रजनी डांगी 2009, चन्द्रसिंह कोठारी 2014 और जी.एस. टांक 2019 में महापौर रहे। अब 2026 में महापौर पद के लिए अनारक्षित सीट होने से मुकाबला खासा दिलचस्प हो गया है।
भाजपा जहां अपने पुराने प्रदर्शन को बरकरार रखने की कोशिश करेगी। वहीं, कांग्रेस लंबे समय से शहर की सत्ता में वापसी के लिए इस मौके को महत्वपूर्ण मानकर चल सकती है। यही वजह है कि महापौर का चुनाव सिर्फ एक पद का चुनाव नहीं रहेगा, बल्कि दोनों दलों के लिए प्रतिष्ठा की बड़ी लड़ाई बनने के आसार हैं।
उदयपुर महापौर की सीट अनारक्षित ओपन होते ही भाजपा के कई लोग सक्रिय हो गए। इनमें भाजपा से प्रमोद सामर, पारस सिंघवी, अतुल चंडालिया, नानालाल बया, रामकृपा शर्मा, यशवंत आंचलिया, जिनेन्द्र शास्त्री, हरीश राजानी, पिंकी मांडावत और अलका मूंदड़ा के नाम चर्चा में हैं।
वहीं, कांग्रेस खेमे में भी दावेदारों की हलचल कम नहीं है। फतह सिंह राठौड़, गोपाल कृष्ण गोपजी, पंकज शर्मा, अरुण टांक, अजय पोरवाल, केकेशर्मा और दिनेश श्रीमाली समेत कई नामों को लेकर राजनीतिक चर्चाएं शुरू हो गई हैं।
| निकाय | इस बार आरक्षण | पिछली स्थिति |
|---|---|---|
| उदयपुर नगर निगम | अनारक्षित ओपन | ओबीसी पुरुष |
| फतहनगर-सनवाड़ | अनारक्षित महिला | एसटी |
| भींडर | अनारक्षित ओपन | सामान्य महिला |
| कानोड़ | ओबीसी ओपन | एसटी महिला |
| सलूंबर | अनारक्षित ओपन | अनारक्षित ओपन |
| मावली | एसटी ओपन | नई बनी |
| वल्लभनगर | एसटी महिला | नई बनी |