
उदयपुर. शहर के नगर निगम बाेर्ड के साथ ही प्रथम नागरिक भी बदलते रहे, लेकिन शास्त्री सर्कल-अशोक नगर मुख्य मार्ग पर स्थित महापौर का बंगला पिछले 22 साल से अपने अगले निवासी का इंतजार कर रहा है। प्राइम लोकेशन पर करीब 4 हजार वर्गफीट में बने इस आवास में भवन के साथ गार्डन और रहने की सुविधाएं भी हैं। इसके बावजूद लंबे समय से वहां कोई महापौर रहने नहीं पहुंचा। अब नगर निगम में नया बोर्ड बनने और पारस सिंघवी के महापौर चुने जाने के बाद एक बार फिर इस बंगले की चर्चा शुरू हो गई है।
बंगला फिलहाल धूल-मिट्टी से सना है। लंबे समय से उपयोग नहीं होने के कारण महापौर के नाम की नेम प्लेट तक गायब हो चुकी है।
पहले अधिकारी का आवास था
निगम अधिकारियों के अनुसार, वर्ष 1994 में पहला बोर्ड बनने से पहले इस भवन में तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर रहा करते थे। निर्वाचित बोर्ड के गठन के बाद इसे निकाय प्रमुख के आवास के तौर पर रखा गया।
पहले बोर्ड में किरण माहेश्वरी सभापति रहीं। उन्होंने इस आवास का उपयोग नहीं किया। इसके बाद वर्ष 1999 में युधिष्ठिर कुमावत सभापति बने और उन्होंने परिवार के साथ इसी बंगले में रहना शुरू किया। करीब पांच साल तक इस भवन में नियमित चहल-पहल रही। इसके बाद वर्ष 2004 में रवींद्र श्रीमाली सभापति बने, लेकिन उन्होंने भी बंगले को आवास नहीं बनाया।
वर्ष 2009 में रजनी डांगी महापौर बनीं। उनका कार्यकाल 2014 तक रहा, लेकिन उन्होंने भी निजी आवास से ही कामकाज किया। वर्ष 2014 से 2019 तक चंद्रसिंह कोठारी और 2019 से 2026 तक जी.एस. टांक महापौर रहे। दोनों ने भी सरकारी आवास का इस्तेमाल नहीं किया। इस तरह 1999 से 2004 के पांच साल को छोड़ दें तो करीब दो दशक से बंगला खाली पड़ा है।
निजी घर बड़े, इसलिए जरूरत नहीं
अब तक सभी महापौर के सरकारी आवास में नहीं रहने की बड़ी वजह उनका अपना बड़ा निजी आवास होना रही। इसके कारण निगम का यह आवास धीरे-धीरे उपयोग से बाहर होता गया। हालांकि बंगले का इस्तेमाल न होना अपने आप में कोई नियम विरुद्ध स्थिति नहीं है। स्थानीय निकायों के निर्वाचित प्रतिनिधियों के लिए सरकारी आवास में रहना अनिवार्य नहीं है।