
उदयपुर. समाज सेवा दान-पुण्य तक सीमित नहीं है। कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो जीवन के सबसे संवेदनशील क्षणों में बिना किसी पहचान और प्रचार की इच्छा के दूसरों का सहारा बनते हैं। शहर में सिंधु सामूहिक सेवा समिति और समाजसेवी हरीश तनवानी ऐसी ही दो प्रेरक मिसाल हैं, जिन्होंने सेवा को अपना जीवन धर्म बना लिया है। एक ओर समिति पिछले एक दशक से परिवारों को गयाजी में पूर्वजों का पिंडदान करवाने की व्यवस्था कर रही है, वहीं दूसरी ओर हरीश तनवानी 45 साल से अंतिम संस्कार के लिए वस्त्र सिलने और शोक संतप्त परिवारों की हर संभव मदद में जुटे हैं।
सिंधु सामूहिक सेवा समिति ने सेवा का ऐसा स्वरूप चुना है, जो दिखावा नहीं, बल्कि संस्कारों और आस्था से जुड़ा हुआ है। समिति के अध्यक्ष अशोक खतुरिया के नेतृत्व में 11 सदस्यीय टीम पिछले दस वर्षों से गयाजी में सामूहिक पिंडदान यात्राओं का आयोजन कर रही है। समिति से जुड़े जगदीश निचलानी बताते हैं कि अब तक 16 सामूहिक यात्राओं के माध्यम से उदयपुर, आसपास के शहरों के साथ ही मप्र और गुजरात के 1100 परिवारों को गयाजी में अपने पूर्वजों का पिंडदान कराने का अवसर मिला है। समिति का उद्देश्य धार्मिक यात्रा को आसान और किफायती बनाना है, ताकि आर्थिक कारण किसी की आस्था के आड़े न आएं। श्याम निचलानी के अनुसार प्रत्येक यात्रा में 70 से 80 श्रद्धालुओं का समूह शामिल होता है। हर साल फरवरी और नवंबर में पांच दिवसीय यात्रा निकाली जाती है। पवन आहूजा सहित कम से कम चार सेवादार पूरी यात्रा में श्रद्धालुओं के साथ रहते हैं और हर जरूरत का ध्यान रखते हैं। राधाकिशन खथुरिया बताते हैं कि ट्रेन टिकट, होटल, जलपान, भोजन, पंडित, नाई, पूजन सामग्री सहित संपूर्ण व्यवस्थाएं समिति करती है। समिति के अशोक खतुरिया, जगदीश निचलानी, श्याम निचलानी, राधाकिशन खथुरिया, किशन तलरेजा, ओमप्रकाश आहूजा, राकेश बजाज, हरीश तनवानी, पवन आहूजा और महेश राजानी जैसे सदस्य बिना किसी स्वार्थ के इस यात्रा को आगे बढ़ा रहे हैं।
साढ़े चार दशक से अनदेखे सेवक
किसी व्यक्ति के जीवन का अंतिम पड़ाव सबसे संवेदनशील होता है। ऐसे समय में अधिकांश लोग केवल शोक व्यक्त करते हैं, लेकिन उदयपुर के 75 वर्षीय हरीश तनवानी पिछले 45 सालों से उस दुख की घड़ी में परिवारों का मौन सहारा बने हुए हैं। सिंधी बाजार स्थित झूलेलाल रेस्तरां के संचालक हरीश तनवानी दैनिक कार्यों से पहले समाज भवन पहुंचकर अंतिम संस्कार में उपयोग होने वाले वस्त्र सिलते हैं। किसी भी सिंधी परिवार में मृत्यु होने की सूचना मिलते ही वे अपने सारे काम छोड़कर अंतिम संस्कार की तैयारियों और व्यवस्थाओं में जुट जाते हैं। यह सेवा न तो मंच पर दिखाई देती है और न ही सुर्खियां बनती है, लेकिन शोक ग्रस्त परिवारों के लिए उनका साथ सबसे बड़ा संबल बनता है। इस निस्वार्थ सेवा के लिए सिंधी समाज ने उन्हें अपने सर्वोच्च सम्मान से सम्मानित भी किया है।