उज्जैन

कालिदास के ग्रंथों मे जिनका जिक्र था, दम तोडऩे लगे वह पौधे

- सिंहस्थ पूर्व तैयार हुए अनुठे कालिदास उपवन होने लगा उजाड़
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Updated: 8 Apr 2018, 8:04 PM IST
patrika
The rare plants have dried up completely in the park

उज्जैन. कालिदास अकादमी क्षेत्र स्थित कालिदास उपवन जिस खूबी के कारण जाना जाता है, वही विशेषता गर्मी में दम तोड़ रही है। उपवन में लगे चुनिंदा दुर्लभ पौधों में से कुछ प्रजाति के पौधे पूरी तरह सूख चुके हैं तो कुछ सूखने की कगार पर हैं। यहां वह पौधे लगे हैं जिनका उल्लेख महाकवि कालिदास ने अपने ग्रंथों में किया है।

सिंहस्थ पूर्व कालिदास उपवन विकसित किया गया था। इस नाम को चरितार्थ करने के लिए उपवन में पौधे भी वही लगाए गए थे जिनका उल्लेख कालिदास के ग्रंथों में है। वन विभाग द्वारा बड़ी राशी खर्च कर जगह-जगह से इन पौधों को संग्रहित किया गया था। कुछ पौधे तो प्रदेश के बाहर व देश के आखिरी छोर से मंगवाए गए थे। लगाए गए लगभग दो दर्जन पौधों में से कुछ पौधे अब दम तौड़ चुके हैं। इसके पीछे बड़ा कारण अनुकुलित वातावरण नहीं मिलना है।

कुछ पौधों को संभाला
एक ओर कुछ पौधों ने दम तोड़ा है वहीं कई पौधों का संभालने में खासी मशक्कत भी हुई है। कुछ पौधे ऐसे भी थे जो ठंडे प्रदेशों से मंगवाए गए थे। आदर्श वातावरण देने के लिए इन पौधों में बर्फ तक डाली गई। इसके अलावा अब कुछ पौधे बड़े भी हो गए हैं जिसके कारण उनके रखरखाव में तुलनात्मक महनत कम हो गई है।

लगे थे यह पौधे

सरल (चीरा), अक्षोट (अखरोट), ताल, पूग (सुपारी) , कदम, वकुल (मोलश्री), निचुल (बेंत), प्लक्ष, कचनार, किंशुक (पलाश), मल्लीका (चमेली), जासमीन, मालती, जूही, मोगरा, माधवीलता, तिलक (दालचीनी), लवंग (लोंग), केवड़ा, साल, इलायची, अंगूर, पान, पढल

इन सूखे पौधों का क्या है उल्लेख
१. निचुल (बेंत)- बिजली के सोने से बना यह बादल ही मेरा छत्र है। निचुल के पेड़ ही मेरे ऊपर अपनी मन्जरियों के चंवर डुला रहे हैं। गर्मी समाप्त हो जाने के कारण मधुर गान करने वाले ये मोर ही भाटों का काम कर रहे हैं और झरनों के मोती की भेंट करती हुई ये पहाडिय़ां ही मेरी प्रजा है।

२. किंशुक (पलाश)- वसंत के आने से किंशुक में फूट निकली हुई कलियां ऐसी जान पड़ती थीं मानों काम के आवेश में लाज छोड़कर किसी कामिनी ने अपने प्रियतमके शरीरपर अनेक नखक्षत कर डाले हों।
३. तिलक (दालचीनी)- जैसे किसी युवती के शृंगार के लिए उसका मुंह चीता जाता है वैसे ही उस तिलक वृक्ष के फूलों पर मंडराते हुए काजल की बुंदियों के समान सुंदर भौंरेऐसे जान पड़ते थे मानो वनस्थलियों का मुख भी चीत दिया गया हो।

४. तांबुल (पान)- लड़ाई हो चुकने पर रघु के वीर सैनिकों ने महेंद्र पर्वत पर पान के पत्ते बिछाकर मदिरालय बनाया और वचहां नारियल की मदिरा के साथ-साथ मानो शत्रुओं का यश भी पी गये।
५. पाटल (पढल)- इन (ग्रीष्म के) दिनों में नहाने में जल बढ़ा भाता है, पाटल में बसा हुआ वन का पवन भी अच्छा लगता है, वृक्षों की घनी छाया में नींद भी अच्छी आती है और संध्या बहुत सुहावनी लगती है।

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