
Sharad Purnima : रविवार को शरद पूर्णिमा है। धार्मिक मान्यताओं के साथ आयुर्वेद में भी इस दिन का विशेष महत्व है। उज्जैन के आयुर्वेद डॉक्टरों के अनुसार, शरद पूर्णिमा पर चंद्रमा की किरणों का सेवन स्वास्थ्य के लिए सबसे हितकर माना जाता है, विशेषकर श्वसन रोगियों के लिए। शरद पूर्णिमा की चांदनी को धार्मिक आस्था के साथ आयुर्वेद में भी विशेष महत्व दिया गया है। आयुर्वेद के अनुसार, शरद ऋतु में पित्त का प्रकोप बढ़ता है। ऐसे में इस ऋतु में चंद्रमा की किरणों का सेवन हितकर माना गया है। यही वजह है कि शरद पूर्णिमा की रात चांदनी में खीर रखने और उसका सेवन करने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। आयुर्वेद में चंद्रमा की किरणों का सेवन हितकर कहा गया है जबकि दूध-चावल की खीर को भी लाभकारी माना गया है।
आयुर्वेद चिकित्सा अधिकारी डॉ. जितेंद्र जैन बताते हैं कि हिंदू पंचांग के अनुसार, शरद पूर्णिमा हर वर्ष आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को आती है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, इस दिन चंद्रमा 16 कलाओं से पूर्ण होता है। चंद्रमा की किरणों से अमृत बरसने की मान्यता है।
आयुर्वेद के अनुसार, ऋतु विभाजन के क्रम में विसर्ग काल वर्षा, शरद और हेमंत ऋतु में होता है। इस काल में सूर्य दक्षिणायन में गति करता है और चंद्रमा पूर्ण बल वाला होता है। चंद्रमा अपनी किरणों से भूमंडल का निरंतर पोषण करता है। इसलिए विसर्ग काल को सौ्य कहा गया है। आयुर्वेद के मतानुसार, वर्षा ऋतु में पित्त का संचय होता है और शरद ऋतु में उसका प्रकोप होता है। प्राचीन काल से ही पूर्णिमा का लोगों के जीवन में विशेष महत्व रहा है, क्योंकि इस दिन चंद्रमा की चांदनी अधिक होती है और धरती पर उसकी किरणों की तीव्रता बढ़ जाती है। चरक संहिता के रचनाकार आचार्य चरक ने शरद ऋतुचर्या के क्रम में स्पष्ट किया है कि शरद ऋतु में उत्पन्न फूलों की माला, स्वच्छ वस्त्र और प्रदोष काल (रात्रि के प्रथम प्रहर) में चंद्रमा की किरणों का सेवन हितकर होता है।
धन्वंतरि आयुर्वेद महाविद्यालय के प्रो. डॉ. प्रकाश जोशी बताते हैं कि आयुर्वेद के आचार्यों ने श्वास रोग को पित्त स्थान से उत्पन्न होने वाली व्याधि माना है। रोग में शरद पूर्णिमा पर खीर खाने की परंपरा है। यह सामान्य परंपरा नहीं, बल्कि आयुर्वेद की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। खीर दूध च चावल से बनती है। आचार्य चरक ने दूध को जीवनीय बताया है। दूध मधुर रस, शीतल वीर्य व शीतल गुण वाला होता है। स्निग्ध, गुरु, मंद व प्रसन्न गुण भी हैं। चावल शीतल वीर्य, मधुर रस व स्निग्ध गुण वाला होने से त्रिदोष शामक है। दूध व चावल की खीर मधुर रस वाली होती है, जो पित्त का शमन करती है। पूर्णिमा की चांदनी में रखी खीर में चंद्रमा की सौम्य किरणों के प्रभाव से शीतल गुण बढऩे की मान्यता है। आचार्य चरक ने लोक-पुरुष सा्य सिद्धांत के संदर्भ में वर्णन किया है कि लोकगत भाव सोम, पुरुषगत भाव के प्रसाद गुण की वृद्धि करता है। इसी के चलते पूर्णिमा की रात खीर खाने का विधान है। श्वास रोगियों को आयुर्वेदिक औषधियों से सिद्ध खीर का सेवन करना चाहिए।