Allahabad High Court Marriage Honor Issue : दो वयस्कों की मर्जी के बीच परिवार की 'इज्जत' नहीं आ सकती। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 'ऑनर किलिंग' के डर के बीच एक जोड़े को सुरक्षा देते हुए पुलिस को सख्त निर्देश जारी किए हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सुरक्षा देना राज्य का कर्तव्य है।
प्रयागराज : इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 'ऑनर किलिंग' और अंतरजातीय/अंतरधार्मिक विवाहों के संदर्भ में एक बेहद महत्वपूर्ण और कड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा है कि जब दो वयस्क व्यक्ति आपसी सहमति से अपनी पसंद के साथी से शादी करते हैं, तो कोई भी तीसरा पक्ष, यहां तक कि उनके परिवार के सदस्य भी, इसे 'इज्ज़त का मसला' (Honour Issue) नहीं बना सकते।
अदालत ने जोर देकर कहा कि संविधान के तहत ऐसे जोड़ों के जीवन, शरीर और संपत्ति की रक्षा करना राज्य (सरकार और पुलिस) का परम कर्तव्य है, भले ही उन्हें खतरा उनके अपने ही परिवार से क्यों न हो।
यह टिप्पणी जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने एक प्रेमी जोड़े की याचिका पर सुनवाई के दौरान की। याचिकाकर्ताओं (जोड़े) ने कोर्ट को बताया कि उन्होंने आर्य समाज मंदिर में अपनी मर्जी से शादी की है और 'उत्तर प्रदेश विवाह पंजीकरण नियम, 2017' के तहत उनके पास वैध विवाह प्रमाण पत्र भी है।
जोड़े का आरोप था कि महिला के परिवार वाले इस शादी के सख्त खिलाफ हैं। उन्होंने न केवल इस रिश्ते को स्वीकार करने से मना कर दिया, बल्कि दूल्हे के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 87 (शादी के लिए मजबूर करने के इरादे से महिला का अपहरण या फुसलाना) के तहत अलीगढ़ में एक झूठी FIR भी दर्ज करवा दी।
याचिकाकर्ताओं ने अदालत में एक संयुक्त हलफनामा पेश किया, जिसमें उन्होंने महिला के परिजनों के इशारे पर अपनी 'ऑनर किलिंग' (इज्ज़त के नाम पर हत्या) होने की गंभीर आशंका जताई थी। मामले की गंभीरता को देखते हुए, हाई कोर्ट ने प्रथम दृष्टया (prima facie) जोड़े के पक्ष में मामला माना। कोर्ट ने कड़े शब्दों में कहा कि वयस्कों की निजी पसंद और उनके जीवन जीने के अधिकार में 'इज्ज़त' के नाम पर दखल देने का अधिकार किसी को नहीं है।
अंतरिम राहत के रूप में, कोर्ट ने निर्देश दिया कि उक्त आपराधिक मामले (FIR) के संबंध में याचिकाकर्ताओं (जोड़े) को गिरफ्तार नहीं किया जाएगा। बेंच ने महिला के परिवार के सदस्यों और रिश्तेदारों को सख्त आदेश दिया कि वे जोड़े को किसी भी तरह का नुकसान न पहुंचाएं। वे न तो उनके घर में घुसने की कोशिश करें और न ही उनसे सीधे या किसी इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से संपर्क करें।
कोर्ट ने अलीगढ़ के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) को व्यक्तिगत रूप से यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि विरोधी पक्ष (लड़की के परिवार) या उनके साथियों द्वारा इस जोड़े को कोई नुकसान न पहुंचे और उन्हें पर्याप्त सुरक्षा मिले।
हाई कोर्ट ने विरोधी पक्ष (लड़की के परिवार) को नोटिस जारी कर दो हफ्ते के भीतर अपना जवाब (counter-affidavit) दाखिल करने का समय दिया है। मामले की अगली सुनवाई 8 अप्रैल को नियत की गई है।