वाराणसी

Recall: बनारस दंगे में मुस्लिमों पर हुई ज्यादती, डीएम-एसपी को हटाइए- पीएम इंदिरा गांधी ने किया था फोन, सीएम बोले- नहीं

इंदिरा गांधी ने बनारस दंगे में मुसलमानों पर पुलिस ज्यादती का आरोप लगाते हुए अपने ही सीएम को डीएम-एसएसपी को हटाने के लिए कहा था। मुख्यमंत्री कमलापति त्रिपाठी ने साफ मना कर दिया था।
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Jan 21, 2026
Banaras danga, Biting the bullet by ajay raj sharma
प्रतीकात्मक तस्वीर (सोर्स: AI)

बात उन दिनों की है, जब कमलापति त्रिपाठी उत्तर प्रदेश में कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री बने थे। त्रिपाठी ठेठ बनारसी थे। वहीं जन्मे, जीवन भर बनारस से प्रेम किया और वहीं प्राण भी त्यागे। 4 अप्रैल, 1971 को उन्होंने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। उनके सीएम बनते ही बनारस 'वीआईपी जिला' बन गया था। वहां नए अफसरों की तैनाती की गई। कहा जाता है, वहां तैनात करने के लिए अफसरों का चयन खुद सीएम ने किया था। 1966 बैच के आईपीएस अजय राज शर्मा भी उनमें एक थे।

शर्मा अपनी किताब 'बाइटिंग द बुलेट' में लिखते हैं कि भले ही लोग 'शाम-ए-अवध और सुबह-ए-बनारस' कहते हों, लेकिन प्रशासनिक रूप से जिले की तस्वीर बड़ी बदसूरत थी। पेशेवर गुंडे, सांप्रदायिक गुटबाजी, नेतागीरी करने वाले छात्र और राजनीति करने वाले नेता…ये सब मिल कर पुलिस-प्रशासन के लिए हमेशा मुश्किल खड़ी किए रहते थे।

एएमयू पर बिल और जल उठा था बनारस

शर्मा ने जब बनारस में जॉइन किया, लगभग उसी समय नए डीएम, एसएसपी ने भी जॉइन किया था। गर्मी जबरदस्त थी। एसएसपी की पत्नी गर्मी के चलते बीमार हो गईं। उन्हें किसी ठंडी जगह पर ले जाना पड़ा। इसलिए एसएसपी को छुट्टी पर जाना पड़ा। वह शर्मा को चार्ज देकर चले गए।

शर्मा को तब तक इस तरह किसी जिले को संभालने का अनुभव नहीं था। और, उन्हें बनारस का चार्ज मिल रहा था, जिस पर सीधे सीएम की नजर रहती थी। शर्मा को घबराहट तो हो रही थी, पर कोई चारा नहीं था।

चार्ज संभालने के कुछ ही दिन बाद एक बड़ी चुनौती सामने आ गई। लोकसभा में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) की स्वायत्तता से जुड़ा एक बिल पेश किया गया। 1875 में सर सैयद अहमद द्वारा स्थापित किए गए एएमयू को अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा प्राप्त था। मुस्लिम इसमें किसी तरह का दखल नहीं चाहते थे। इसलिए लोकसभा में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय संशोधन विधेयक पेश किए जाने से उनमें नाराजगी थी।

बनारस में मुसलमानों ने इसके खिलाफ एक जुमे (शुक्रवार) को प्रदर्शन करने का फैसला किया। एसएसपी तो पहले से छुट्टी पर थे और संयोग ऐसा था कि जिस दिन प्रदर्शन होना था, उस दिन डीएम भी दौरे पर जाने वाले थे। उन्हें जिले में सीएम के एक कार्यक्रम की तैयारियों का जायजा लेने के लिए जाना था। शर्मा ने उनसे आग्रह भी किया कि दौरे पर किसी और दिन चले जाएं, लेकिन उन्होंने नहीं माना और कहा कि सिटी मजिस्ट्रेट पूरे समय आपके साथ रहेंगे।

भीड़ के हमलों से पुलिस लाचार

अब सारा दारोमदार शर्मा पर ही था। शुक्रवार की सुबह उन्होंने सुरक्षा इंतजाम का पूरा जायजा लिया , लेकिन तभी खबर आई कि लंगड़े हाफिज की मस्जिद के पास भारी भीड़ जमा हो रही है। यह जगह दशाश्वमेध थाने के तहत आती थी। भीड़ जमा हुई। कुछ लोगों ने काफी उग्र भाषण दिया। उसके बाद भीड़ आपा खोने लगी। कुछ लोग ईंटें फेंकने लगे। जब तक शर्मा वहां पहुंचे तब तक करीब तीन हजार लोगों की भीड़ काफी उग्र हो गई थी। लोग नारे लगा रहे थे और पत्थर फेंक रहे थे। वहां ड्यूटी पर तैनात पीएसी की टुकड़ी पहले से लाचार हो गई थी। ज्यादातर सिपाही जख्मी हो चुके थे। उनके लिए खड़ा रहना भी मुश्किल हो रहा था। उन्होंने जब शर्मा को केवल चार सिपाहियों के साथ आते देखा तो यही सलाह दी कि और पुलिस बल आने तक अपने आपको सुरक्षित जगह पर रखें।

शर्मा ने आंसू गैस दस्ता बुलवाने का ऑर्डर दिया। यह दस्ता पास में ही तैनात था। उन्होंने जल्दी से जल्दी पुलिस बल भेजने के लिए कहा और भीड़ को शांत करने की कोशिश की। उन्होंने चेतावनी दी कि धारा 144 के बावजूद अगर भीड़ बनी रही तो पुलिस को बल प्रयोग करने के लिए मजबूर होना होगा।

आंसू गैस से संभली स्थिति

भीड़ का नेतृत्व करने वाले लोग सुनने को तैयार नहीं थे। वे और उग्र हो रहे थे। इसी बीच एक बड़ा पत्थर शर्मा की ओर आया और उनकी जीप का शीशा तोड़ गया। इसके बाद और पत्थरों से हमले हुए। किसी तरह शर्मा और उनकी टीम ने खुद को बचाया। इस बीच आंसू गैस दस्ता भी आ गया था। तब शर्मा ने आखिरी चेतावनी दी। भीड़ ने इसे भी अनसुना कर दिया। तब शर्मा ने भीड़ का नेतृत्व करने वाले शख्स को निशाना बना कर आंसू गैस का गोला दाग दिया। इसने तेज आवाज के साथ नेता को जख्मी कर दिया। जख्म उसकी जांघ में हुआ। भीड़ में से आवाज आने लगी- फायरिंग हो गई, फायरिंग हो गई। इसके बाद भीड़ तितर-बितर हो गई। इस बीच पीएसी के और जवान पहुंच गए थे। उन्होंने गड़बड़ करने वाले दर्जनों लोगों को गिरफ्तार किया और घायल नेता को अस्पताल भिजवाया।

जुमे की नमाज के बाद भड़की हिंसा

उस समय तो स्थिति काबू में आ गई, अब डर था कि कहीं जुमे की नमाज के बाद हंगामा-हिंसा न हो। एहतियात के तौर पर कर्फ्यू लगाने का विकल्प तो था, लेकिन डीएम इसके पक्ष में नहीं थे। उनका मानना था कि सीएम के शहर में कर्फ्यू लगाने की बात सीएम को पसंद नहीं आएगी। उनका कहना था- पूरे शहर को बंद कैसे करा सकते हैं?

लेकिन हुआ वही, जिसका डर था। जुमे की नमाज खत्म होते ही हिंसा भड़क गई। पुलिस को 13 जगहों पर गोली चलानी पड़ी। इससे हिंसा भड़कने से तो रुक गई, लेकिन मुसलमानों का गुस्सा बढ़ गया।

'अल्लाह-हू-अकबर' और 'हर-हर-महादेव' के नारे

सीएम के शहर में दंगा हुआ था। लखनऊ से दिल्ली तक हिल गई। राज्य में पुलिस के दूसरे सबसे बड़े अफसर एआईजी को बनारस में कैंप करने के लिए भेजा गया। वह उसी रात बनारस पहुंच गए। शहर में 'अल्लाह-हू-अकबर' और 'हर-हर-महादेव' के नारे अभी भी गूंज रहे थे। रात में भी कई जगह पत्थरबाजी हुईं। ज्यादातर हमलों के निशाने पर पुलिस ही थी। अनेक पुलिसकर्मी घायल हुए। अजय राज शर्मा को भी हल्की चोट आई।

जमीन पर बैठ हजामत बनवा रहे थे सीएम, दिल्ली से आया फोन

हालात का जायजा लेने खुद सीएम आए। दिन भर वह शहर के कई हिस्सों में गए और लोगों से मिले। अगली सुबह उन्होंने डीएम और अजय राज शर्मा को अपने घर बुलाया। दोनों पहुंचे तो देखा सीएम जमीन पर ही बैठे हुए थे। एक नाई उनकी हजामत बना रहा था। दोनों अफसर भी जमीन पर ही बैठ गए और उनको घटना की पूरी रिपोर्ट दी। वह अफसरों से बातचीत कर ही रहे थे कि दिल्ली से एक फोन आया। फोन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का था।

सीएम ने नहीं मानी पीएम की बात

अजय राज शर्मा लिखते हैं कि इंदिरा गांधी ने क्या कहा, यह तो पता नहीं, लेकिन मुख्यमंत्री के जवाब से इतना साफ समझा जा सकता था कि जिस तरह स्थिति से निपटा गया था उससे वह खुश नहीं थीं। प्रधानमंत्री का मानना था कि अल्पसंख्यकों पर ज्यादा सख्ती की गई। मुस्लिमों में से कुछ के प्रधानमंत्री से व्यक्तिगत संपर्क थे। उनका मानना था कि पुलिस ने निष्पक्षता नहीं दिखाई और हिंदुओं की तुलना में मुसलमानों पर ज्यादा बल प्रयोग किया।

प्रधानमंत्री ने सीएम से कहा कि डीएम और एसएसपी को सस्पेंड कर दें। सीएम ने यह बात नहीं मानी। उन्होंने अफसरों का पूरा बचाव करते हुए कहा कि वह खुद शहर घूमे हैं और अनेक लोगों से बात करके आए हैं। पुलिस-प्रशासन की ओर से कोई गलती नहीं हुई है। उल्टे, दंगों को प्रभावी तरीके से नियंत्रित करके समय रहते स्थिति को और बिगड़ने से बचाया गया है।
शर्मा लिखते हैं कि सीएम का समर्थन मिल जाने से उनका सस्पेंशन तो बच गया, लेकिन उच्चस्तरीय जांच से वे नहीं बच सके। यूपी सरकार के गृह सचिव की अध्यक्षता में जांच कमेटी बनी, जिसने अफसरों की कोई गलती नहीं पाई। इसके बाद एक और जांच कमेटी बनी। दो-तीन साल की जांच के बाद इस कमेटी को भी पुलिस-प्रशासन की कोई चूक नहीं मिली।

Updated on:
21 Jan 2026 04:13 pm
Published on:
21 Jan 2026 02:27 pm
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