Global Buddhist Scholars Gather at BHU : काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में 17 से 19 फरवरी तक आयोजित अंतरराष्ट्रीय बौद्ध सम्मेलन में आठ देशों के विद्वान पालि साहित्य, बौद्ध दर्शन और त्रिपिटक अध्ययन पर मंथन करेंगे। 80 शोध-पत्रों की प्रस्तुति के साथ यह आयोजन भारत-एशिया बौद्ध संवाद और सांस्कृतिक संबंधों को नई मजबूती देगा।
BHU Buddhist Conference: विश्व बौद्ध समुदाय और अकादमिक जगत के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर के रूप में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के पालि एवं बौद्ध अध्ययन विभाग द्वारा 17 से 19 फरवरी 2026 तक तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय बौद्ध सम्मेलन का आयोजन किया जा रहा है। यह सम्मेलन पालि साहित्य, बौद्ध दर्शन, त्रिपिटक अध्ययन, बौद्ध परंपराओं की तुलनात्मक समीक्षा और समकालीन संदर्भों में बौद्ध विचारों की प्रासंगिकता जैसे विषयों पर केंद्रित होगा।सम्मेलन का आयोजन केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, अंतरराष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान, उत्तर प्रदेश संस्कृति विभाग और तोयो विश्वविद्यालय (जापान) के संयुक्त तत्वावधान में किया जा रहा है। तीन दिनों में कुल 80 चयनित शोध-पत्र प्रस्तुत किए जाएंगे, जिन पर गहन चर्चा होगी।
सम्मेलन में म्यांमार, कोरिया, श्रीलंका, नेपाल, कंबोडिया, जापान, थाईलैंड और वियतनाम सहित कई देशों के विद्वान, प्रोफेसर, शोधकर्ता और बौद्ध अध्ययन के विशेषज्ञ भाग लेंगे। यह आयोजन भारत-एशिया बौद्ध संवाद को नई ऊर्जा प्रदान करेगा। विभिन्न तकनीकी सत्रों में पालि त्रिपिटक, अट्ठकथा परंपरा, बौद्ध तर्कशास्त्र, थेरवाद और महायान दर्शन, तुलनात्मक बौद्ध अध्ययन तथा अंतरराष्ट्रीय बौद्ध विमर्श जैसे विषयों पर विचार-विमर्श होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह सम्मेलन न केवल अकादमिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होगा, बल्कि सांस्कृतिक कूटनीति के स्तर पर भी भारत की भूमिका को सुदृढ़ करेगा।
17 फरवरी को आयोजित उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि के रूप में नव नालंदा महाविहार के कुलपति प्रो. सिद्धार्थ सिंह उपस्थित रहेंगे। सत्र की अध्यक्षता अंतर्राष्ट्रीय बौद्ध कनफेडरेशन के प्रो. रवींद्र पंथ करेंगे। विशिष्ट अतिथि के रूप में तोयो विश्वविद्यालय के प्रो. केंजी ताकाहाशी अपने विचार रखेंगे। 19 फरवरी को समापन सत्र में केन्द्रीय बौद्ध अध्ययन संस्थान के कुलपति प्रो. राजेश रंजन मुख्य अतिथि होंगे। अध्यक्षता प्रो. उमा शंकर व्यास करेंगे। समापन अवसर पर सम्मेलन की संस्तुतियां प्रस्तुत की जाएंगी और भविष्य में अंतरराष्ट्रीय शोध सहयोग की दिशा तय की जाएगी।
पालि भाषा को भारत की सबसे प्राचीन ज्ञात भाषाओं में माना जाता है। प्राचीन ब्राह्मी लिपि में लिखित सम्राट अशोक के शिलालेख और स्तंभ इसके प्रमाण हैं। भगवान गौतम बुद्ध ने अपने उपदेश पालि भाषा में दिए थे, जिससे यह जनसामान्य की भाषा बनी। हाल ही में भारत सरकार द्वारा पालि को शास्त्रीय भाषा का दर्जा दिए जाने से इसके संरक्षण और अध्ययन को नई दिशा मिली है। बीएचयू में आयोजित यह सम्मेलन पालि भाषा के साहित्यिक, दार्शनिक और सांस्कृतिक आयामों पर वैश्विक स्तर पर विमर्श का अवसर प्रदान करेगा।
पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह ने कहा कि यह सम्मेलन भारत और एशियाई देशों के बीच बौद्ध शिक्षा, पर्यटन और सांस्कृतिक संबंधों को सुदृढ़ करेगा। उनके अनुसार, भारत बौद्ध ज्ञान और विरासत का केंद्र रहा है, और ऐसे आयोजन इस पहचान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और मजबूत करेंगे।
उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार बौद्ध पर्यटन सर्किट को विकसित करने, ऐतिहासिक स्थलों के संरक्षण और अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए लगातार प्रयासरत है। वाराणसी, सारनाथ, कुशीनगर और श्रावस्ती जैसे स्थल वैश्विक बौद्ध समुदाय के लिए आस्था और अध्ययन के प्रमुख केंद्र हैं।
सम्मेलन के दौरान शोध-पत्रों की प्रस्तुति के अलावा पांडुलिपि विज्ञान, डिजिटल आर्काइविंग, बौद्ध शिक्षा के आधुनिकीकरण और अंतरराष्ट्रीय शोध साझेदारी पर भी चर्चा होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि एआई और डिजिटल तकनीक के युग में बौद्ध ग्रंथों का डिजिटलीकरण और वैश्विक स्तर पर साझा अध्ययन आवश्यक है। इससे न केवल शोध को नई गति मिलेगी, बल्कि युवा पीढ़ी को भी बौद्ध विचारधारा से जोड़ने का अवसर मिलेगा।
वाराणसी, जिसे आध्यात्मिक राजधानी कहा जाता है, एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय विमर्श का केंद्र बनने जा रहा है। बीएचयू का यह सम्मेलन शहर की शैक्षणिक और सांस्कृतिक पहचान को वैश्विक मंच पर स्थापित करेगा। बौद्ध दर्शन शांति, करुणा और मध्यम मार्ग का संदेश देता है। ऐसे समय में जब विश्व विभिन्न चुनौतियों से जूझ रहा है, बौद्ध विचारों की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है। सम्मेलन का उद्देश्य इन विचारों को आधुनिक संदर्भों में पुनर्स्थापित करना है।