
Tripindi Shradh in Kashi: धर्म और आध्यात्मिक की नगरी काशी में एक ऐसी तस्वीर भी देखने को मिली, जिसने लोगों को हैरान कर दिया। पितृपक्ष में अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा रखने वाले और विदेशों में रहने वाले लोग ऑनलाइन माध्यम से काशी से जुड़े हुए नजर आए। मॉरीशस, इटली, इंग्लैंड, फ्रांस, दक्षिण अफ्रीका और थाईलैंड समेत कई देशों में रहने वाले लोगों ने जूम एप के माध्यम से काशी में चल रहे पितृ कर्म में हिस्सा लिया। श्रद्धालुओं अपने घर से ही संकल्प लिया, जबकि काशी में मौजूद उनके प्रतिनिधियों ने पिंडदान और तर्पण कराया।
मॉरीशस से काशी पहुंचे स्वामी अरूणानंद गिरी ने बताया कि कई बार ऐसा होता है कि श्रद्धालु चाह कर भी पितृपक्ष में काशी नहीं आ पाते और अपने पितरों का पिंडदान नहीं कर पाते। ऐसे में लोग अब ऑनलाइन माध्यम से काशी से जुड़ रहे हैं। मॉरीशस से करीब 250, इटली से करीब 50 और इंग्लैंड से लगभग 20 श्रद्धालु ऑनलाइन जुड़े, जिन्होंने अपने पितरों का पिंडदान किया। इसके अलावा अन्य देश से भी कई लोगों ने जुड़कर इसमें हिस्सा लिया। उन्होंने बताया कि इस दौरान विदेशों में बैठे श्रद्धालुओं ने आनलाइन माध्यम से काशी में चल रही पूजा को देखा और अपना नाम, गोत्र और पूर्वजों का नाम लेकर संकल्प लिया। इसके बाद काशी में मौजूद प्रतिनिधियों ने पितरों के नाम से पिंडदान और गंगा में तर्पण किया।
स्वामी अरूणानंद गिरी ने बताया कि चुकी लोगों की संख्या काफी अधिक होती है और प्रत्येक व्यक्ति का नाम याद रखना पुरोहितों के लिए मुश्किल हो जाता है और कई बार यह संभव भी नहीं हो पाता। इसलिए श्रद्धालु खुद से अपने पितरों का नाम लेते हैं, ताकि इसमें कोई गलती ना हो सके। इस दौरान पूरी प्रक्रिया से वह सीधे ऑनलाइन माध्यम से जुड़े रहते हैं। उन्होंने बताया कि पितृ कर्म के लिए काशी के अलावा हरिद्वार, प्रयागराज और गया जी का भी धार्मिक महत्व माना जाता है। विदेश में रहने वाले श्रद्धालु को इन स्थानों की जानकारी भी दी जाती है और पिंडदान व तर्पण की परंपरा के बारे में बताया जाता है।
धार्मिक मान्यता के मुताबिक, जिस तिथि को किसी व्यक्ति की मृत्यु हुई हो, उस तिथि पर उसका श्राद्ध किया जाता है। मृत्यु की तिथि मालूम न होने पर सर्व पितृ अमावस्या के दिन श्रद्धा और तर्पण किया जाना चाहिए। तर्पण में गंगाजल, काले तिल, जौ और अन्य सामग्री का प्रयोग किया जाता है। पितृपक्ष में ऑनलाइन माध्यम की उपलब्धता होने के कारण यह उन लोगों के लिए सहारा बन रहा है जो विदेशों में रहते हैं और पितृ पक्ष में काशी नहीं पहुंच पाए। हजारों किलोमीटर की दूरी के बावजूद भी अपने पूर्वजों का स्मरण कर काशी से ऐसे श्रद्धालु जुड़ जाते हैं। स्वामी अरूणानंद गिरी ने बताया कि इसमें सबसे अच्छी बात यह है कि विदेशों में रहने वाली नई पीढ़ी भी अपने परिवार, गोत्र और धार्मिक परंपराओं से जुड़ रही है।