
Varanasi News: "पिंडदान तो एक बहाना है, असल में अंधे मां-बाप को जगाना है…"वाराणसी के पवित्र दशाश्वमेध घाट पर जब वैदिक मंत्रोच्चार गूंज रहे थे, तब गंगा की लहरें भी जैसे बेटियों के इस मौन दर्द से ठहर सी गईं। अवसर था पितृपक्ष की मातृ नवमी का, जब 'आगमन सामाजिक संस्था' के तत्वावधान में डॉ संतोष ओझा ने उन बदनसीब बेटियों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान और तर्पण अनुष्ठान किया, जिन्हें दुनिया में आने से पहले ही उन्हीं के अपनों ने कोख में मार दिया। सनातन शास्त्रों में वर्णित निर्देशों के अनुसार 5 वैदिक आचार्यों के सानिध्य में लगभग 10 हजार अजन्मी बेटियों का पिंडदान, तर्पण, पंचबलि और ब्राह्मण भोज संपन्न हुआ।
श्राद्ध पक्ष के सबसे उत्तम एवं मोक्षदायी काल में गंगा के घाट पर मां गंगा की पवित्र मिट्टी से विशेष वेदी का निर्माण कर अनुष्ठान का शुभारंभ हुआ। गंगा की पावन माटी से पिंड वेदी का निर्माण कर गंगाजल, कुशा एवं अग्नि से भूमि का संस्कार किया गया। वैदिक मंत्रोच्चार एवं शांति पाठ के साथ श्राद्धकर्ता एवं संस्था के संस्थापक सचिव डॉ. संतोष ओझा ने वैदिक आचार्यों के निर्देशन में कोख में मार दी गईं अजन्मी बेटियों की अतृप्त आत्माओं का श्रद्धापूर्वक आवाहन किया गया। इसके साथ ही पितृसत्तात्मक अंधाधुंधता से मुक्ति और उनकी आत्मा की शांति का संकल्प लिया गया।
अजन्मी बेटियों के प्रति पश्चाताप और सम्मान प्रकट करते हुए कुशा, जौ, तिल एवं गंगाजल के साथ पिण्ड अर्पित कर पिंड पूजन कच्चा सूत, चंदन, फूल-माला, धूप-दीप नैवेद्य प्रदान कर प्रत्येक पिण्ड को बेटी के प्रतीक रूप में स्थापित कर उनकी सद्गति हेतु प्रार्थना किया गया। सनातन रीतियों का पालन करते हुए दक्षिण दिशा की ओर मुख कर अजन्मी आत्माओं को जल अर्पित (तर्पण) किया गया, ताकि उनकी आत्मा को परम शांति और मोक्ष प्राप्त हो सके। अनुष्ठान के अंत में समाज में व्याप्त इस कुरीति के प्रति ईश्वर से क्षमा-याचना की गई और पिंडों का मां गंगा की धारा में आदरपूर्वक विसर्जन कर शांति की कामना की गई।
अनुष्ठान की भव्यता और संवेदनशीलता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि सुबह 7 बजे से ही दशाश्वमेध घाट पर संस्था के दर्जनों कार्यकर्ता जुटने लगे थे। जौ के आटे, शहद, देसी घी, काले तिल और पवित्र गंगाजल के पावन मिश्रण से 10 हजार पिंडों का निर्माण किया गया। महिला सशक्तिकरण और कन्या भ्रूण हत्या जैसे महापाप के विरुद्ध वर्ष 2001 से लगातार जन-जागरण अभियान चला रही 'आगमन संस्था' का यह 13वां वार्षिक पिंडदान अनुष्ठान था। श्राद्धकर्ता और संस्था के संस्थापक सचिव डॉ संतोष ओझा पिछले 12 वर्षों में अब तक 1.5 लाख से अधिक अजन्मी बेटियों का तर्पण कर चुकी है। इस वर्ष के 10 हजार पिंडों को मिलाकर यह आंकड़ा 1 लाख 60 हजार पार कर गया है।
संस्था के संस्थापक सचिव डॉ. संतोष ओझा ने बताया कि सनातन धर्म में बेटियों को दो कुलों का रक्षक और लक्ष्मी का स्वरूप माना गया है। लेकिन आधुनिकता और आधुनिक तकनीक के इस दौर में लोग पेट में ही उनकी हत्या कर अपने और समाज के विनाश का रास्ता चुन रहे हैं। हमारा यह अनुष्ठान केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि उन अंधे माता-पिता और सोए हुए समाज को जगाने की एक तीखी आवाज़ है।