वाराणसी

दुर्लभ है काशी के गंगा में मिला शिवलिंग, 18वीं शताब्दी का होने का दावा

Varanasi news: मछुआरों के जाल में फंसे शिवलिंग को लेकर इतिहास और आस्था का रहस्य एक बार फिर से उभर कर सामने आया है। गंगा नदी से बरामद हुआ दो क्विंटल वजनी शिवलिंग अब रहस्य का केंद्र बन चुका है..
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Jun 10, 2026
Shivling in varanasi
काशी में मिला 2500 साल पुराना शिवलिंग (फोटो- पत्रिका)

Shivling found in Varanasi :वाराणसी में डोमरी-सुजाबाद इलाके में गंगा नदी से बरामद हुआ शिवलिंग अत्यंत ही दुर्लभ किस्म का है। इतिहासकारों ने दावा किया है कि यह शिवलिंग 18वीं शताब्दी का है और इस शिवलिंग पर एक नहीं बल्कि चार नाग की आकृति बनी हुई है। वहीं, मंदिर में स्थापित किए जाने के बाद लोगों के दर्शन पूजन का सिलसिला लगातार जारी है। लोग दूरदराज से मंदिर में शिवलिंग पर जलाभिषेक करने पहुंच रहे हैं। वहीं, कुछ लोगों ने इसका नाम गंगेश्वर महादेव, जबकि कुछ लोगों ने नागेश्वर महादेव रखा है।

अरघे के नीचे सर्प की आकृति

मछुआरों के जाल में फंसे शिवलिंग को लेकर इतिहास और आस्था का रहस्य एक बार फिर से उभर कर सामने आया है। गंगा नदी से बरामद हुआ दो क्विंटल वजनी शिवलिंग अब रहस्य का केंद्र बन चुका है। बताया जा रहा है की शिवलिंग के अरघे के नीचे एक बड़े सर्प की आकृति है, जबकि आगे के दूसरे भाग में घुमावदार दूसरा सर्प भी उगेरा गया है। वहीं, शिवलिंग के ठीक नीचे एक और सर्प की आकृति बनी है और उसका फन आगे की तरफ है। वहीं, चौथा सर्प आगे की तरफ अगले भाग के विपरीत दिशा में है और यह सबसे छोटा सर्प है।

क्या बोले भूगोलविद

काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के भूगोल विभाग के प्रोफेसर राणा पीबी सिंह ने बताया है कि चार सांपों वाला शिवलिंग अत्यंत विशेष महत्व रखता है और यह काशी में पहला ऐसा शिवलिंग है जिस पर इस तरह की आकृति बनी हुई है। उन्होंने बताया है कि यह यजुर्वेद, सामवेद, ऋग्वेद और अथर्ववेद का प्रतीक है। प्रोफेसर सिंह के मुताबिक, यह सर्प जीवन के चार लक्षण धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को दिखा रहे हैं। इसका मतलब यह है कि यदि कोई व्यक्ति पुरुषार्थ को साधना चाहता है, तो उसे भगवान भोलेनाथ की शरण में जाना चाहिए।

प्रोफेसर सिंह ने बताया कि यह शिवलिंग 18वीं शताब्दी का है और 3 से ज्यादा नाग वाले शिवलिंग को नागेश्वर महादेव कहा जाता है। उन्होंने दावा किया है कि यह महारानी अहिल्याबाई होलकर के समय का भी हो सकता है। प्रोफेसर सिंह ने बताया कि अपने समय में अहिल्याबाई होल्कर ने कई मंदिरों का जीर्णोद्धार कराया था और मंदिरों में मूर्तियों की स्थापना करवाई थी। यह संभव है कि किसी कारणवश इसे गंगा में प्रवाहित कर दिया गया होगा, जिसके बाद यह काशी के घाट पर बरामद हुआ है।

क्या बोले इतिहासकार

बीएचयू के इतिहासकार प्रोफेसर मारुति नंदन प्रसाद तिवारी ने दावा किया है कि इस तरह का शिवलिंग आज तक काशी में कहीं भी नहीं देखा गया। उन्होंने कहा कि काशी के ललिता घाट और पंचकोशी क्षेत्र में चार नाग वाले शिवलिंग मौजूद हैं, लेकिन अरघे के नीचे किसी भी शिवलिंग में सर्प की आकृति नहीं बनी हुई है। उन्होंने कहा कि इसे बनाने वाले ने काफी सोच समझकर बनाया होगा।

मछुआरों को मिला था शिवलिंग

दरअसल, 5 जून को मछली पकड़ने के दौरान मछुआरों के जाल में यह दुर्लभ शिवलिंग फस गया था। इसके बाद मछुआरों ने इसे बाहर निकाल कर पास ही स्थित गंगा मंदिर में इसे स्थापित कर दिया। मछुआरों ने बताया कि इसका वजन करीब 2 क्विंटल के आसपास है और करीब 18-19 लोगों की टीम ने मिलकर इस गंगा नदी से बाहर निकाला। मंदिर में स्थापित किए जाने के बाद यहां श्रद्धालु दर्शन पूजन करने पहुंच रहे हैं।

Updated on:
10 Jun 2026 12:03 pm
Published on:
10 Jun 2026 07:46 am
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