भूख की भयानक आग में जलते अफगानिस्तान से रूह कंपा देने वाली कहानी सामने आई है, जहां मजबूर पिता अपने मासूम बच्चों को सिर्फ इसलिए बेचने पर मजबूर हैं ताकि परिवार के बाकी सदस्य दो वक्त की रोटी खा सकें।
Afghanistan Hunger Crisis: तालिबान राज में अफगानिस्तान इस वक्त भुखमरी के भीषण नरक में तब्दील हो चुका है। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक करीब 47 लाख लोग यहां अकाल की कगार पर हैं। हालात इतने बदतर हैं कि घोर प्रांत में बेबस एक पिता भूख से अपने परिवार को बचाने और बीमार बच्चों के इलाज के लिए अपनी मासूम बेटियों को महज कुछ पैसों में बेचने या कम उम्र में ही उनकी शादी का सौदा करने पर मजबूर हैं। वहीं, अस्पतालों में दवाइयों की भारी कमी के कारण नवजातों की मृत्यु दर 10% तक पहुंच चुकी है
अफगानिस्तान इस वक्त भुखमरी के उस नरक में तब्दील हो चुका है, जहां जिंदा रहने के लिए बाप अपनी ही बेटियों की कीमत लगाने को मजबूर हैं। घोर प्रांत के रहने वाले अब्दुल राशिद अजीमी की कहानी सुनकर किसी भी इंसान का कलेजा फट जाएगा। अपनी सात साल की जुड़वां बेटियों, रुकिया और रोहिला को सीने से चिपकाकर रोते हुए अब्दुल ने कहा कि 'मैं अपनी बेटियों को बेचने को तैयार हूं, मैं गरीब हूं, कर्ज में डूबा हुआ हूं और लाचार हूं, 'मैं काम से सूखे होंठ, भूखा, प्यासा, परेशान होकर घर आता हूं।
मेरे बच्चे मेरे पास आते हैं और कहते हैं 'बाबा, हमें कुछ रोटी दो'। लेकिन मैं क्या दे सकता हूं? काम कहां है?' पिता ने कहा अगर मैं एक बेटी बेच दूं, तो मैं अपने बाकी बच्चों को कम से कम चार साल तक खिला सकता हूं, 'इससे मेरा दिल टूट जाता है, लेकिन यही एक तरीका है।'
उधर, इसी इलाके के सईद अहमद की दास्तान तो और भी खौफनाक है। उनकी पांच साल की बेटी शाइका को अपेंडिक्स और लिवर में सिस्ट था। इलाज के लिए फूटी कौड़ी नहीं थी, तो उन्होंने अपनी जान से प्यारी बेटी को एक रिश्तेदार के हाथों दो लाख अफगानी (करीब 3200 डॉलर) में बेच दिया। सईद अहमद ने नम आंखों से अपनी मजबूरी को बताया कि 'मेरे पास मेडिकल खर्च उठाने के लिए पैसे नहीं थे। इसलिए मैंने अपनी बेटी को एक रिश्तेदार को बेच दिया, 'अगर मैंने उस समय पूरी रकम ले ली होती, तो वह उसे अपने साथ ले जाता।
इसलिए मैंने उससे कहा कि अभी मुझे सिर्फ उसके इलाज के लिए जरूरी पैसे दे दो, और अगले पांच सालों में तुम मुझे बाकी पैसे दे देना, जिसके बाद तुम उसे अपने साथ ले जा सकते हो। वह उसकी बहू बनेगी। उन्होंने आगे कहा कि 'अगर मेरे पास पैसे होते, तो मैं कभी भी यह फसला नहीं लेता, अगर सर्जरी के बिना उसकी मौत हो गई तो क्या होगा, इतनी कम उम्र में अपने बच्चे को किसी और को सौंपने में बहुत दर्द होता है। फिर भी, क्योंकि मैं उसके इलाज का खर्च नहीं उठा सकता था, इसलिए मैंने सोचा कि कम से कम वह जिंदा तो रहेगी।'
संयुक्त राष्ट्र (UN) के आंकड़े बताते हैं कि अफगानिस्तान में चार में से तीन लोग अपनी बुनियादी जरूरतें पूरी नहीं कर पा रहे हैं। देश की 10 फीसदी से ज्यादा आबादी यानी करीब 47 लाख लोग अकाल से महज एक कदम दूर हैं। लोग सूखी रोटी और गर्म पानी पीकर दिन काट रहे हैं। लेकिन इस तबाही की सबसे बड़ी वजह दुनिया से मिलने वाली मदद में हुई भारी कटौती है। पिछले साल अमेरिका और ब्रिटेन जैसे बड़े देशों ने अपनी इमदाद रोक दी, जिससे इस साल मिलने वाली कुल मदद में 70 फीसदी की गिरावट आई है।
तालिबान सरकार के डिप्टी प्रवक्ता हमदुल्ला फितरत ने सारा ठीकरा पुरानी सरकार और अमेरिका पर फोड़ते हुए कहा कि 'आक्रमण के 20 सालों के दौरान, अमेरिकी डॉलर की आमद के कारण एक कृत्रिम अर्थव्यवस्था का निर्माण हुआ, आक्रमण की समाप्ति के बाद, हमें विरासत में गरीबी, कठिनाइयां, बेरोजगारी और अन्य समस्याएं मिलीं।'
अब हालात ये हैं कि भूख और इलाज की कमी से मासूम बच्चे दम तोड़ रहे हैं। स्थानीय अस्पतालों का आलम यह है कि एक-एक बेड पर दो-दो नवजात बच्चे ऑक्सीजन के सहारे जिंदगी की जंग लड़ रहे हैं। नर्स फातिमा हुसैनी कहती हैं कि यहां हर दिन तीन-तीन बच्चे मर जाते हैं। डॉक्टर मोहम्मद मोसा ओल्दात ने बताया कि नवजात इकाई में मृत्यु दर 10% तक पहुंच गई है जो बेहद चिंताजनक है। अस्पताल में दवाइयां तक नहीं हैं। लोग इतने गरीब हैं कि इलाज का खर्च न उठा पाने के कारण अपने गंभीर रूप से बीमार बच्चों को बीच में ही अस्पताल से घर ले जा रहे हैं, ताकि वे भगवान भरोसे जी सकें या दम तोड़ दें।