
Nepal PM Balen Shah Report Card: नेपाल की राजनीति में जनरेशन जेड (Gen Z) की लहर पर सवार होकर उभरे और खुद को एक अलग छवि में पेश करने वाले बालेन शाह के कार्यकाल को एक महीना पूरा हो चुका है। 27 मार्च को जब उन्होंने पदभार संभाला था। तब युवाओं और बदलाव के समर्थकों के बीच एक नई उम्मीद जगी थी। लेकिन 30 दिनों के भीतर ही उनकी सरकार बड़े सुधारों के बजाय विवादों के चलते ज्यादा चर्चा में रही है। मजबूत जनसमर्थन के बावजूद बालेन शाह के लिए शुरुआती दौर चुनौतीपूर्ण नजर आ रहा है, जिससे उनके समर्थकों खासतौर पर युवाओं में बेचैनी के संकेत दिखने लगे हैं।
सत्ता संभालते ही बालेन शाह ने पहली कैबिनेट बैठक में 100 सूत्रीय शासन सुधार एजेंडे को मंजूरी दी थी। इस योजना में मंत्रालयों के आकार को छोटा करने, अनुपयोगी सरकारी बोर्डों के विलय और प्रशासनिक सेवाओं को राजनीतिक प्रभाव से मुक्त करने जैसे बड़े वादे शामिल थे।
इसके अलावा नागरिक सेवाओं को डिजिटल बनाने और पासपोर्ट व लाइसेंस जैसे दस्तावेजों को डाक के जरिए घर तक पहुंचाने की योजना भी सामने रखी गई। हालांकि ड्राइविंग लाइसेंस वितरण में तेजी जैसे कुछ शुरुआती सकारात्मक संकेत जरूर मिले हैं। लेकिन बड़े संरचनात्मक बदलाव अभी भी शुरुआती चरण में ही दिखाई देते हैं। जिससे सुधारों की रफ्तार पर सवाल उठ रहे हैं।
सरकार के पहले महीने में ही कैबिनेट स्तर पर उठे विवादों ने प्रशासनिक स्थिरता पर सवाल खड़े किए हैं। श्रम मंत्री दीपक साह को अपनी पत्नी की नियुक्ति को लेकर विवाद के बाद पद छोड़ना पड़ा था। जबकि गृह मंत्री सूदन गुरुंग ने एक कारोबारी से कथित संबंधों को लेकर उठे विवादों के बीच इस्तीफा दे दिया था। कम समय में दो मंत्रियों के जाने से सरकार की निर्णय प्रक्रिया और आंतरिक समन्वय को लेकर चर्चा तेज हुई है।
सरकार के कुछ फैसलों को लेकर कानूनी और राजनीतिक बहस भी सामने आई है। पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और पूर्व गृह मंत्री रमेश लेखक के खिलाफ की गई कार्रवाई को लेकर प्रक्रिया पर सवाल उठे जिसके बाद अदालतों ने हस्तक्षेप करते हुए उन्हें राहत दी। इसी तरह, पर्याप्त सबूतों के अभाव में नेपाली कांग्रेस के नेता दीपक खड़का की रिहाई ने भी सरकार की कार्यप्रणाली पर प्रश्न खड़े किए। इन घटनाओं को लेकर आलोचकों का कहना है कि कुछ फैसलों में जल्दबाजी देखने को मिली है।
बालेन शाह ने अपने चुनावी अभियान में युवाओं के लिए रोजगार के अवसर बढ़ाने और विदेश पलायन कम करने का वादा किया था। हालांकि अभी तक इस दिशा में बड़े बदलाव स्पष्ट रूप से नजर नहीं आए हैं। महंगाई और ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी ने आम लोगों पर दबाव बढ़ाया है। नेपाल ऑयल कॉरपोरेशन द्वारा ईंधन कीमतों में हालिया बढ़ोतरी भी चर्चा का विषय बनी रही है।
इसके अलावा, नदियों के किनारे बसे लोगों को हटाने की कार्रवाई को लेकर पुनर्वास और मानवाधिकार से जुड़े सवाल भी उठे हैं।
प्रधानमंत्री बनने के बाद से बालेन शाह ने सार्वजनिक रूप से सीमित संवाद किया है। न तो उन्होंने कोई बड़ा संबोधन दिया है और न ही प्रेस कॉन्फ्रेंस की है। उनकी इस चुप्पी को लेकर राजनीतिक गलियारों और जनता के बीच सवाल उठ रहे हैं। खासकर तब जब उनकी पार्टी के कुछ नेताओं पर आरोपों को लेकर चर्चा चल रही है। इसके साथ ही प्रधानमंत्री कार्यालय तक पहुंच सीमित होने की खबरों ने पारदर्शिता को लेकर भी बहस को जन्म दिया है।
फिलहाल, नेपाल में बदलाव की उम्मीद के साथ उभरी बालेन शाह की सरकार अपने शुरुआती चरण में ही कई चुनौतियों का सामना कर रही है। एक ओर बड़े सुधारों का रोडमैप है तो दूसरी तरफ विवाद और प्रशासनिक फैसलों पर उठते सवाल हैं। ऐसे में सबसे बड़ी चुनौती अब भरोसा बनाए रखने की है। खासतौर पर उस युवा वर्ग का, जिसने इस बदलाव को संभव बनाया है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि सरकार अपने वादों को जमीन पर उतार पाती है या नहीं।