
China aid Iran Lebanon means : अमेरिका के साथ जंग खत्म होने के बाद इससे दुनिया की सियासत में नया समीकरण बन रहा है। अब रूस ही नहीं, अब चीन भी ईरान के साथ दोस्ती की पींगे बढ़ा रहा है। चीन ने 'मानवीय संकट' के नाम पर अमेरिका के इन दुश्मन देशों ईरान और लेबनान की मदद करने का फैसला किया है। वह इन दोनों देशों में 'रिकवरी और पुनर्निर्माण' के कामों में उसकी मदद करेगा। चीनी विदेश मंत्रालय के आधिकारिक प्रवक्ता और उप महानिदेशक लिन जियान ने बीजिंग में पत्रकारों से बातचीत करते हुए कहा, ईरान और लेबनान में युद्धों के कारण हुए मानवीय संकट से चीन को गहरा दुख है, इसलिए उनकी मदद की जा रही है। चीन ने पासा फेंका है कि वह उनकी अर्थव्यवस्था और आजीविका को बेहतर बनाने में और मदद करना चाहता है।
इसे इस तरह समझें कि अमेरिका, ईरान और लेबनान को नापसंद करता है और उसका झुकाव इजरायल की ओर है, यानि चीन अमेरिका के दुश्मन देशों को अपने पाले में लाना चाहता है। उल्लेखनीय है कि 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान के खिलाफ युद्ध शुरू करने के बाद से यह दूसरी बार हुआ है कि जब बीजिंग ने तेहरान के समक्ष मदद करने की पेशकश की है। चीन ने इससे पहले मार्च में भी ईरान को मदद भेजी थी। तब तो अमेरिका के साथ जंग खत्म होने का समझौता भी नहीं हुआ था। यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब अमेरिका और ईरान युद्ध खत्म करने के मकसद से पाकिस्तान की मध्यस्थता वाले एक समझौते पर सहमत हुए हैं। दोनों देशों के बीच शुक्रवार को स्विट्जरलैंड में समझौते पर हस्ताक्षर होंगे।
दरअसल इस मदद का एक और पहलू है। अमेरिका और इजरायल की ओर से की गई जंग के दौरान ईरान पर किए गए हमलों से दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातक चीन के लिए ऊर्जा सुरक्षा, निर्यात क्षमता और भू-राजनीतिक रणनीति की एक गंभीर समस्या पैदा हो गई थी। बीजिंग के विशाल तेल भंडार और विविध स्रोतों से अल्पकालिक सुरक्षा तो मिल सकती थी, लेकिन जंग के कारण ईरान के लिए चले लंबे संघर्ष से घरेलू आर्थिक दबाव बढ़ा है और चीन के वैश्विक लक्ष्य कमजोर हुए हैं।
ईरानी तेल पर अमेरिका अपना हक मानता व समझता रहा है, लेकिन जंग के बावजूद वह ईरान को झुकाने में नाकाम रहा, अब चीन इस मौके का फायदा उठाना चाहता है । ईरान की मदद में चीन का स्वार्थ भी निहित है। वह लंबे समय से चीन के लिए ऊर्जा का एक महत्वपूर्ण और रियायती स्रोत रहा है। अमेरिकी प्रतिबंधों से बचने के लिए चीन ईरान से दूसरे रास्तों से तेल ले रहा था। प्रतिबंधित तेल के आयात से जुड़े प्रतिष्ठा और वित्तीय जोखिम से बचने के लिए, यह तेल मुख्य रूप से बड़ी चीनी सरकारी तेल कंपनियों के बजाय छोटी, निजी रिफाइनरियों द्वारा खरीदा जाता था। ईरानी तेल का चीन की नई सीमा पार सीआईपीएस के माध्यम से रेनमिनबी में भुगतान किया जाता था, ताकि अंतरराष्ट्रीय भुगतान के लिए SWIFT मैसेजिंग नेटवर्क का उपयोग न किया जाए, क्योंकि इससे प्रतिबंधित वित्तीय लेनदेन की जानकारी पश्चिमी अधिकारियों को मिल सकती थी।
अमेरिका और इजरायल के साथ लेबनान के तनाव का मुख्य कारण सशस्त्र शिया राजनीतिक समूह हिजबुल्लाह है। अमेरिका व इजरायल की नजर में हिजबुल्लाह एक आतंकवादी संगठन है, जबकि लेबनान की आधिकारिक सरकार के अमेरिका के साथ ऐतिहासिक रूप से सामान्य राजनयिक रिश्ते रहे हैं। हिजबुल्लाह का लेबनान की राजनीति में भारी प्रभाव है। यह समूह इजरायल का कट्टर दुश्मन है और अमेरिका को भी अपना प्रमुख विरोधी मानता है।
दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है और चीन की तो हमेशा से सोच ही यह रही है कि दुनिया में जहां कहीं अमेरिका का दुश्मन देश है, उसके साथ नजदीकी बढ़ाई जाए। ऐसे में उसने अमेरिका को धता बताते हुए ईरान और लेबनान के प्रति सॉफ़्ट कॉर्नर रखते हुए मदद के पुल पर कारोबार का नया रास्ता बनाया है। डोनाल्ड ट्रंप खुद को ग्लोबल लीडर मानते हैं, लेकिन न तो वे जंग में ईरान को हरा पाए और न उसके तेल भंडार ले पाए, वहीं इजरायल के कारण वे लेबनान को भाव नहीं देते हैं । इन हालात में शी जिनपिंग कछुआ चाल चलते हुए भी ईरान व लेबनान के नजदीक होने में कामयाब होते हुए नजर आ रहे हैं।