अमेरिका और इजराइल के ईरान पर हमलों ने चीन की सालों की मेहनत और खरबों रुपये की योजनाओं को तहस-नहस कर दिया है। चीन ने ईरान में इतना पैसा लगाया था कि वो लगभग अपना घर समझ रहा था, लेकिन अब एक रात में सब बर्बाद हो गया।
सोचिए, आपने किसी के घर में इतना पैसा लगाया कि वो घर आपका ही हो जाए। और फिर एक रात उस घर पर किसी और ने हमला कर दिया। बस यही हाल इस वक्त चीन का है।
अमेरिका और इजराइल ने ईरान पर जो हमले किए हैं, उसने चीन की सालों की मेहनत और खरबों रुपये की योजनाओं को एक झटके में तहस-नहस कर दिया है।
साल 2021 में चीन और ईरान के बीच एक बड़ा समझौता हुआ था। 400 अरब डॉलर के बदले चीन ईरान में बंदरगाह बनाएगा, रेलवे लाइनें बिछाएगा, अस्पताल खड़े करेगा और सस्ते दाम पर ईरानी तेल लेगा।
ये सिर्फ एक व्यापारिक सौदा नहीं था, ये चीन की पूरी मध्य-पूर्व की रणनीति थी। ईरान को वो चाहता था जो भारत के लिए श्रीलंका था, एक ऐसा पड़ोसी जो आपकी ताकत को और बढ़ा दे। लेकिन अब, वो पूरा हिसाब-किताब गड़बड़ा गया है।
2005 से चीन ईरान में पैसा लगा रहा था। 2016 में राष्ट्रपति शी जिनपिंग खुद तेहरान गए और बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव यानी BRI के तहत ईरान को अपनी योजना का केंद्र बनाया। मकसद साफ था, अफ्रीका और यूरोप तक व्यापार का रास्ता बनाना और अमेरिका को उसके ही इलाके में घेरना।
रेलवे लाइनें, मेट्रो, खनन, हाईवे, परमाणु बिजली घर, स्मार्ट सिटी, सौर ऊर्जा। चीन ने ईरान को एक तरह से अपना "प्रोजेक्ट" बना लिया था। BRI के सभी देशों में ईरान वो जगह थी जहां से चीन को सबसे ज्यादा फायदे की उम्मीद थी।
पिछले साल जून में हुए 'मिडनाइट हैमर' और उसके बाद के हमलों ने ईरान की परमाणु क्षमता को बुरी तरह नुकसान पहुंचाया। यूरेनियम संवर्धन की सुविधाएं तबाह हुईं, लंबी दूरी की मिसाइलें और ड्रोन की ताकत कमजोर पड़ी। जो ईरान चीन के लिए अमेरिका को उलझाने का हथियार था, वो खुद कमजोर पड़ गया।
श्रीलंका के अखबार डेली मिरर की एक रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि चीन की "ग्रैंड स्ट्रेटेजी" अब बिखर चुकी है। बंदरगाहों, रेल गलियारों और ऊर्जा ढांचे से जुड़े BRI प्रोजेक्ट अब खतरे में हैं। ईरान के रास्ते जो सुरक्षित जमीनी ऊर्जा मार्ग बनाना था, वो अब अनिश्चितता में है।
मजेदार बात ये है कि चीन कुछ बोल भी नहीं सकता। ईरान खाड़ी के दूसरे देशों पर हमले कर रहा है जहां चीन ने भी पैसा लगाया है। अगर चीन ईरान को रोकने की कोशिश करे तो एक दोस्त खोएगा।
न रोके तो बाकी देशों में निवेश डूबेगा। दोनों तरफ नुकसान। यानी जो चीन अमेरिका को घेरने की चाल चल रहा था, आज खुद उस चाल में उलझ गया है। शतरंज की भाषा में कहें तो शह और मात।