
अमेरिका लगातार दबाव बना रहा है कि चीन ईरान से तेल खरीदना बंद कर दे। लेकिन बीजिंग का रुख साफ है। उसने स्पष्ट रूप से यह कह दिया है कि चीन किसी भी एकतरफा अमेरिकी प्रतिबंध को नहीं मानता।
चीन का साफ संदेश है कि दोनों देशों के बीच व्यापार सिर्फ उनका अपना मामला है। यह बात साफ संकेत दे रही है कि चीन आसानी से अमेरिका के आगे नहीं झुकने वाला है।
चीन इस वक्त ईरान का सबसे बड़ा तेल खरीदार है। ईरान के कुल तेल शिपमेंट का करीब 80 फीसदी चीन ही लेता है। यह तेल ज्यादातर छोटे रिफाइनरीज यानी टीपॉट रिफाइनरीज में जाता है। टैंकरों के नेटवर्क से इसकी असली उत्पत्ति छुपाई जाती है।
इस वजह से अमेरिका के लिए इसे रोकना और भी मुश्किल हो जाता है। हालांकि, ईरानी तेल पर चीन बहुत ज्यादा निर्भर नहीं है। अगर वाशिंगटन ज्यादा जोर डाले तो तकनीकी रूप से चीन इसे बंद भी कर सकता है। लेकिन ऐसा करने की रणनीतिक कीमत बहुत भारी पड़ेगी।
राष्ट्रपति शी जिनपिंग के लिए यह सिर्फ तेल का मामला नहीं है। अगर चीन अमेरिका के दबाव में झुक गया तो घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह संदेश जाएगा कि बीजिंग दबाव में आ जाता है। शी ऐसा मैसेज नहीं देना चाहते। उनके लिए यह खतरनाक मिसाल बन सकता है। इसलिए चीन अपनी स्टैंड पर अड़ा हुआ दिख रहा है।
शी जिनपिंग 24 सितंबर को वाशिंगटन जाने वाले हैं। दोनों देशों के बीच पहले से ही कई तनाव हैं। अमेरिका चीनी टेक कंपनियों पर पाबंदियां लगा रहा है। एआई रेस में देशों को एक तरफ चुनने का दबाव भी बन रहा है।
इन सबके बावजूद फिलहाल यह नहीं लगता कि मुलाकात रद्द होगी। अमेरिका के लिए सबसे जरूरी है कि चीन से दुर्लभ खनिज यानी रेयर अर्थ मिनरल्स का सप्लाई जारी रहे। वहीं चीन चाहता है कि व्यापार युद्ध थमा रहे और टैरिफ कम रहें। दोनों पक्ष इन मुद्दों पर ध्यान दे रहे हैं।
अमेरिका चाहे जितना दबाव बनाए, चीन के लिए ईरानी तेल सिर्फ ऊर्जा का स्रोत नहीं है। यह उसकी स्वतंत्र विदेश नीति का प्रतीक भी है। बीजिंग बार-बार कह चुका है कि वह किसी के दबाव में अपनी नीतियों को नहीं बदलेगा।
आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि सितंबर की मुलाकात में यह मुद्दा कितना जगह पाता है। फिलहाल चीन की तरफ से कोई नरम रुख नजर नहीं आ रहा।