
Trump Iran Sanctions: ‘ईरान को तबाह कर देंगे’—ट्रंप का बड़ा ऐलान! अब प्रतिबंधों की सुनामी, चीन पर भी दबाव (फोटो सोर्स:@aljazeera.com)
Trump Iran Sanctions: अमेरिका और ईरान के बीच करीब छह महीने से जारी टकराव अब युद्ध के मैदान से निकलकर अर्थव्यवस्था की नसों तक पहुंचता दिख रहा है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तेहरान को अलग-थलग करने के लिए अभूतपूर्व आर्थिक अभियान का ऐलान किया है। अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने संकेत दिया है कि आने वाले दिनों में प्रतिबंधों का दायरा और सख्त होगा। इस रणनीति में चीन और अमेरिकी सहयोगियों की भूमिका भी बेहद अहम मानी जा रही है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ आर्थिक दबाव को नई ऊंचाई पर ले जाने का संकेत दिया है। उन्होंने उन देशों और कंपनियों को भी गंभीर आर्थिक परिणाम भुगतने की चेतावनी दी है, जो ईरान को व्यापार, वित्त या दूसरी कारोबारी सुविधाओं के जरिए सहारा देते हैं।
वॉशिंगटन की रणनीति साफ दिखाई दे रही है ईरान की कमाई के स्रोतों, खासकर तेल कारोबार और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय नेटवर्क को कमजोर किया जाए, ताकि तेहरान पर सैन्य कार्रवाई का दबाव बनाए बिना राजनीतिक समझौते के लिए मजबूर किया जा सके।
अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने कहा है कि ईरान के खिलाफ लगाए जाने वाले नए प्रतिबंध अब तक के सबसे कठोर प्रतिबंध होंगे। उनका तर्क है कि आर्थिक मोर्चे पर अधिकतम दबाव बढ़ने से अमेरिका को बड़े स्तर पर नए सैन्य अभियान की जरूरत कम पड़ सकती है।
बेसेंट ने संकेत दिया कि प्रतिबंधों की विस्तृत योजना जल्द सार्वजनिक की जाएगी। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वॉशिंगटन ईरान के साथ कारोबार करने वाले दूसरे देशों और कंपनियों पर भी दबाव बढ़ाने की तैयारी में है।
इस पूरी रणनीति में चीन सबसे अहम कड़ी बनकर उभरा है। वजह है ईरानी तेल का कारोबार। चीन ईरान के तेल का बड़ा खरीदार है और इसलिए अगर बीजिंग अमेरिकी दबाव के मुताबिक तेहरान के साथ आर्थिक संबंध सीमित करता है, तो ईरान की आय पर सीधा असर पड़ सकता है।
लेकिन चीन ने अमेरिकी प्रतिबंधों को समाधान मानने से इनकार किया है और कूटनीतिक रास्ते पर जोर दिया है। ऐसे में वॉशिंगटन और बीजिंग के बीच यह मुद्दा एक नए आर्थिक टकराव को जन्म दे सकता है।
तेहरान ने अमेरिका के नए दबाव को स्वीकार करने के बजाय इसे खारिज कर दिया है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने अमेरिकी अभियान को 'आर्थिक आतंकवाद' करार देते हुए कहा कि वॉशिंगटन की नीति अपने घरेलू आर्थिक संकट से ध्यान भटकाने की कोशिश है।
ईरानी पक्ष का कहना है कि वर्षों से चले आ रहे प्रतिबंधों के बावजूद अमेरिका अपने राजनीतिक लक्ष्य हासिल नहीं कर पाया है। इसलिए नए प्रतिबंधों को लेकर तेहरान का रुख फिलहाल टकराव वाला ही दिखाई दे रहा है।
आर्थिक दबाव के साथ समुद्री मोर्चे पर भी अमेरिकी कार्रवाई तेज हुई है। अमेरिकी सेंट्रल कमांड के मुताबिक, ईरान की नाकाबंदी लागू कराने के दौरान अमेरिकी बलों ने अब तक 67 वाणिज्यिक जहाजों का मार्ग बदला, तीन जहाजों को निष्क्रिय किया और दो अन्य पर सवार होकर जांच की।
यह कार्रवाई अरब सागर और रणनीतिक समुद्री मार्गों के आसपास बढ़ते तनाव के बीच हुई है। अमेरिका का मकसद ईरान तक पहुंचने वाले समुद्री व्यापार पर निगरानी और दबाव बढ़ाना बताया जा रहा है।
अमेरिका-ईरान तनाव बढ़ने का सबसे तेज असर अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में दिखाई दे रहा है। अमेरिकी कच्चे तेल WTI की अक्टूबर डिलीवरी कीमत 86 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर चली गई, जबकि ब्रेंट क्रूड करीब 94 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचा। WTI में सप्ताह के दौरान लगभग छह प्रतिशत की बढ़त की संभावना जताई गई।
इसका कारण केवल प्रतिबंध नहीं हैं। निवेशकों को डर है कि यदि ईरान के तेल निर्यात पर और शिकंजा कसा गया या स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से जहाजों की आवाजाही बाधित हुई, तो वैश्विक आपूर्ति पर दबाव बढ़ सकता है।
बेसेंट के बयानों से संकेत मिलता है कि वॉशिंगटन आर्थिक दबाव और समुद्री नाकाबंदी को एक साथ इस्तेमाल करना चाहता है। यानी एक तरफ ईरान के व्यापार और वित्तीय स्रोतों को कमजोर करना और दूसरी तरफ समुद्र के रास्ते आर्थिक गतिविधियों पर निगरानी बढ़ाना।
अमेरिकी प्रशासन का मानना है कि इससे तेहरान पर सैन्य दबाव बढ़ाए बिना आर्थिक दबाव बनाया जा सकता है। हालांकि, यह रणनीति कितनी प्रभावी होगी, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि चीन और दूसरे प्रमुख कारोबारी साझेदार अमेरिकी प्रतिबंधों के साथ कितना सहयोग करते हैं।
Updated on:
21 Aug 2026 07:12 am
Published on:
21 Aug 2026 07:05 am
